मैं मेघनाथ हूँ


मैं मेघनाथ हूँ, मेघनाथ,
पुरे ब्रह्माण्ड में,
कोई नहीं जो मुझे रोक सके.
मैं जब रथ पे होता हूँ,
विराजमान, सारे जहाँ में,
कोई नहीं जो मेरे अश्वो को बाँध सके.
मैं पल में पताका फहरा दूँ,
त्रिलोक में कहीं भी.
मुझसे कोई नहीं छुप सकता,
पुरे ब्रह्माण्ड में कहीं भी.
मैं जब करता हूँ तीरों का संधान,
ऐसा शक्तिमान कोई नहीं रण में,
जो मेरे भीषण प्रहरों से बच सके.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तुम अपनी वेणी में मेरे पुष्प तो लगा के देखो


मैं भीषण तीरों से बाँध दूंगा,
शेषनाग के फनों को.
तुम एक बार तो हमसे,
प्रेम कर के देखो।
मैं इंद्रा को हराकर भी,
अधूरा हूँ तुम बिन.
तुम एक बार अपने नैनों,
के बाण चला के तो देखो।
मेरा तुमसे हैं वादा ए देवी,
तुम यूँ ना अधीर हो.
मैं असुर भले ही हूँ मगर,
मृत्यु तक एक-भार्या नियम में बधूंगा।
तुम अपने मधुर अधरों से,
मुझे प्राणनाथ कह के तो देखो।
ऐसी कोई शक्ति नहीं सृष्टि में,
जो तोड़ सके तुमसे मेरे प्रेम को.
ऐसी कोई अप्सरा भी ना होगी,
जो अब मोह सके इस मन को.
तुम अपनी वेणी में,
मेरे पुष्प तो लगा के देखो।
मैं तुम्हारी लिए,
शिव – विष्णु समस्त, साक्षात परम ब्रह्म,
से टकरा जाऊं।
मैं अपने भीषण बल से,
एक पल में, समस्त क्षीर – सागर सुखा दूँ.
तुम एक बार ह्रदय से अपने भय मिटा के,
मेरे अंक-पास में आके तो देखो।

 

परमीत सिंह धुरंधर

This is based on the first love story of the universe: Meghnaath and Sulochana.

कृष्ण – अर्जुन


असमंजस में अर्जुन,
की तीर किसपे चलाये?
रणभूमि में कहीं पितामह,
कहीं भ्राता नजर आएं.
दुविधा देख पार्थ की,
वासुदेव मुस्काये।
ये कैसा मोह है अर्जुन?
तुम आज तक नहीं निकल पाए.
पथराए मन से,
बोझिल आँखों को बंद किये,
माथे पे सिकन,
गांडीव थामे, अर्जुन खड़े कपकपाये।
लगे अर्जुन गिनाने, हर रिश्ता अनंत बार,
कभी भीष्म, कभी द्रोण,
कभी याद आये मामा शल्य का प्यार।
तो विकराल रूप ले कर भगवान बोले,
खोल अर्जुन अब तू अपनी आँखे।
सृष्टि का तुझको आज सच बतलाऊं,
मन-मस्तिक से तेरे ये भ्रम मिटाऊं।
मेरे सिवा न कुछ, जो अनंत, अमिट हो,
ना कोई ऐसा सृष्टि में,जो अटल और अडिग हो.
फिर इस जगत में ऐसा क्या?
जिसमे तुम अकड़े – जकड़े हो,
किसके प्रेम में बंध के यूँ खड़े हो.
यहाँ ना कोई अपना न पराया है,
सब मेरी और केवल मेरी ही माया है.
मैं ही पर्वत – पहाड़ में,
मैं ही अंत और आरम्भ में.
मैं ही दुर्योधन के दम्भ में,
मैं ही द्रोण के द्वेष में.
मैं ही धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह हूँ,
मैं ही उर्वशी के योवन में.
मैं ही भीष्म का धर्म हूँ,
और मैं ही इन अश्वों के वेग में.
मैं ही प्रेम हूँ,
मैं ही हूँ मन का विकार।
मैं ही मिलन का रस हूँ,
और मैं ही हूँ तन का श्रृंगार।
पर हे अर्जुन,
फिर भी मैं त्रुटिहीन हूँ,
मैं नीरस, निर्जीव,
और श्रृंगार विहीन हूँ.
इस कुरुक्षेत्र में यहाँ,
बस मेरी ही जय है,
मेरी ही पराजय है.
मैं हैं बचूंगा अंत में,
इन सबके अवशेष में.
इनको भी ज्ञान है,
की निश्चित है इनकी हार,
फिर भी देखो,
ये तैयार है करने को मुझपे प्रहार।
इनको भी ज्ञात है,
की मैं ही हूँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड,
फिर भी आ गए है रणभूमि में ये,
रखने अपने इस जीवन का मान.
वो रोकना चाहते है जिस समय की प्रवाह को,
मैं ही वो समय हूँ.
वो खेल रहें हैं अपना खेल जिस धर्म की आड़ में,
मैं ही वो धर्म हूँ.
वो बांधना चाहते है इस धरती पे जिस जीवन को,
मैं चाहता हूँ मुक्ति उस जीवन की.
मैं चाहता हूँ मुक्ति उस धर्म की, उस समय की,
अपने इस ब्रह्माण्ड की, उसके प्रवाह की.
मैं चाहूँ तो मौत दूँ इनको, प्रलय के प्रलाप से,
मैं चाहूँ तो मौत दूँ इनको सूरज के भीषण ताप से.
मगर मैं जानता हूँ इनको संतोष मिलेगा,
तुम्हारे तीक्ष्ण तीरों के घाव पे.
तुम नहीं तो कोई और मेरा साधन होगा,
बिना तुम्हारे ही मेरा लक्ष्य साध्य होगा।
फिर भी तुम नहीं रोक पाओगे इस विध्वंश को,
नहीं देख पाओगे कल से,
अपने प्रियजनों के इस भेष को.
तो उठो अर्जुन,
अपनी तीरों से मेरा पथ प्रज्जवलित करों,
मेरी सृष्टि को आज तुम,
संग मेरे स्वचालित करो.
मुझमे समाहित हो,
मुझमे सम्मिलित हो,
बिना बंधे माया – मोह में,
मेरी तरह प्रवाहित हो.

परमीत सिंह धुरंधर

कुरुक्षेत्र II


कर्म ही जीवन,
कर्म ही साधन।
कर्म ही,
मानव का संसाधन।
कर्म ही साँसे,
कर्म ही आँखें।
कर्म से ही,
मानव का भाग्योदय।
कंटीले पथ पे,
कर्म ही राही।
मृत्यु-शैया पे,
कर्म ही साथी।
कर्म ही पुण्य,
कर्म ही पाप.
कर्म ही,
मानव का लाभ.
कर्म ही वेद-पुराण,
कर्म ही गुरु-ज्ञान,
कर्म ही,
मानव का अभिमान।
कर्म से बंधे है सभी,
कर्म से उठे, और मिटे है सभी.
कर्म से ही, सजा,
ये कुरुक्षेत्र है.
इस कुरुक्षेत्र में भी,
सबमे भेद, बस उनका कर्म है.

परमीत सिंह धुरंधर

कुरुक्षेत्र


मेरा विस्तार देख,
मेरा आकार देख.
मैं ही हूँ सृष्टि,
आज मुझको साक्षात देख.
आँखों से अपने,
ज्ञान को मिटा के.
मूरख बनके तू,
मेरा प्रमाण देख.
सब कुछ मेरा है,
मुझसे बना है.
एक दिन सबको फिर,
मुझमे ही मिलना है.
तेरा है क्या यहाँ,
तूने क्या रचा है.
जिसके मोह में तू,
इतना बंधा है.
तेरा ये ज्ञान,
ये तीर – कमान।
सब मेरा है,
मुझसे बंधा है.
मैं न जो चाहूँ,
तो न गांडीव हिले।
न तुझसे,
एक भी तीर चले.
शुक्र कर मेरा तू,
ए मूरख।
मैंने अपने इस यज्ञ में,
बस तुझको ही पुरोहित चुना है.
मैं ही हूँ द्रोण में,
मैं ही हूँ कर्ण में.
मैं ही हूँ भीम का बल,
मैं ही दुर्योधन – धृतराष्ट में.
मैं ही पालक विष्णु,
मैं ही संहारक शिव हूँ.
मैं शिशु के भूख में,
मैं ही हूँ माँ के दूध में.
जब मुझको ही मोह नहीं,
अपनों के नाश का.
जब मुझको ही भय नहीं,
मेरी रची सृष्टि के सर्वनाश का.
फिर क्यों तू इतना,
इनसे बंधा है.
जिनके प्रेम में तू,
इतना जकड़ा है.
उनके ही तीरों पे,
तेरा नाम चढ़ा है.
फिर तू क्यों इतना,
अपने कर्म – पथ से डिगा है.
तूने देखा है अब तक,
प्रेम मेरा।
आज मेरे संग,
मेरी लीला भी देख.
तूने देखा है,
द्रोण – भीष्म की शक्ति यहाँ।
अब इस धरा पे,
उनकी मुक्ति भी देख.
बिना सुदर्शन के,
मेरी युद्ध – नीति भी देख.
सबके प्रेम में बंधा हूँ मैं,
मगर मेरी आत्मा की,
इनसे मुक्ति भी देख.
बढ़ मेरे साथ आज इस पथ पे,
मेरे ह्रदय में प्रज्जवलित अग्नि को देख.
ये सर्वनाश नहीं,
एक आरम्भ है.
मेरे साथ तू आज,
एक नए युग का शुभारंभ भी देख.

परमीत सिंह धुरंधर

जय श्री राम-1


जब – जब जीवन ने,
संघर्ष किया।
सागर ने रोकी राहें,
पत्थरों ने साथ दिया.
जब छूट गए अपने,
कोसों दूर.
सत्य की लड़ाई में,
भील, रीक्ष और बानरों ने,
संग युद्ध किया.
जब – जब सत्ता ने,
संहार किया.
मौन हुए जब वेद-पाठी,
और देव-गण.
एक नारी के संघर्ष में,
पक्षियों (जटायुं) ने,
युद्ध आरम्भ किया.
जग को सिखला गए प्रभु,
राम-रूप में,
सत्य की राह पे मानव ने,
भगवान से बढ़के काम किया.
जब – जब जीवन ने,
संघर्ष किया।
सागर ने रोकी राहें,
पत्थरों ने साथ दिया.

परमीत सिंह धुरंधर

जय श्री राम


बल से बड़ी बुद्धि,
बुद्धि से बड़ी भक्ति.
जो राम की चरणो में है,
उसी की है मुक्ति.
जिसके एक ही नाम से,
पत्थर तक जुड़ गए.
सागर की लहरों को मथ के,
किनारों को जोड़ गए.
जहाँ सूझे ना,
कुछ भी आकर,
वहाँ काम आती है बस,
राम-नाम की युक्ति.
बस छूकर अहिल्या को.
पत्थर की मूरत से,
नारी-रूप दिया.
चखकर जूठे बेरों को,
भील सबरी को,
माँ का सुख दिया.
जग में कभी नहीं है,
प्रेम से बड़ी कोई शक्ति.
बल से बड़ी बुद्धि,
बुद्धि से बड़ी भक्ति.
जो राम की चरणो में है,
उसी की है मुक्ति.

परमीत सिंह धुरंधर

बाप ने जिंदगी दी है, बाप के लिए जिंदगी दे दूंगा.


मेघनाथ: प्रणाम काका श्री. अच्छा हुआ, आप दिख गए. मई असमंजस में था की आप से मिलकर रणभूमि में जाऊं या जाकर मिलूं।
विभीषण: पुत्र, मैं तो तुम्हारा सदा से शुभचिंतक रहा हूँ. मेरी तुमसे कोई बैर नहीं है पुत्र.
मेघनाथ: हा हा हा हा!! काका श्री, पिता से बैर और उसके पुत्र से प्रेम। मैं वैसा पुत्र नहीं हूँ.
विभीषण: मैं तुम्हारे पिता का सागा भाई हूँ, उनका बैरी नहीं।
मेघनाथ: तो दुश्मनों की छावनी में क्यों ?
विभीषण: क्यों की, लंकेश धर्म भूल चुके हैं. तुम तो ज्ञानी हो. मैंने भ्राता कुम्भकर्ण को भी समझाया। तुम्हे भी कहता हूँ, ये युद्ध छोड़ के श्री राम के शरण में आ जाओ. इसमें हम सब का भला छुपा है.
मेघनाथ: बहुत-बहुत धन्यवाद काका श्री। अगर सबका भला इसी में छुपा रहता तो आपकी माता श्री आज यहाँ आपके साथ होती, वहाँ लंका में नहीं।
मेघनाथ: अगर श्री राम भगवान भी है, और स्वयं नारायण भी अपने असली रूप में आ जाएँ, तो भी मैं लंका का प्रतिनिधित्व करूंगा।
मेघनाथ: आखिर में इतना ही कहूँगा, काका श्री की “बाप ने जिंदगी दी है….. बाप के लिए जिंदगी दे दूंगा।”

परमीत सिंह धुरंधर

विश्वामित्र – मेनका: एक प्रेम कथा या बलात्कार


विश्वामित्र – तुम मेरा प्रेम ठुकरा कर उस इंद्रा की सभा में नाचना चाहती हो. मैंने वैसे कितने इन्द्रलोक बना कर छोड़ दिए मेनका।
मेनका – तुमने इन्द्रलोक तो जरूर बनाये विश्वामित्र, पर तुम कभी भी स्वयं इंद्रा नहीं बन पाये।
विश्वामित्र – तो क्या तुम्हारा प्रेम सिर्फ इंद्रासन पे बैठे व्यक्ति से है? अच्छा है, मैं कभी इंद्रा नहीं बना! मैं अपने प्रेम को हारते तो देख सकता हूँ, लेकिन बिकते नहीं।
मेनका – प्रेम क्या है? विशवमित्र पहले ये तो जान लो फिर हारने और बेचने की बात करना। मैं तो जिससे प्रेम करती हूँ उसके लिए तुम क्या, रावण के पास भी चली जाऊं। तुम प्रेम की बात करते अच्छे नहीं लगते, जिसने एक पशु को पाने की जिद्द पे अपनी हज़ारों रानियों को छोड़ दिया।
विश्वामित्र – मेनका। मैंने उनको नहीं छोड़ा, वल्कि अपना सबकुछ छोड़ दिया। उनका कुछ नहीं छिना है. और मैंने अपने स्वार्थ के लिए उनका जिस्म और चरित्र तो दाँव पे नहीं लगाया है. मैंने तुम्हारे प्रेमी की तरह उन्हें वशिष्ठ के पास तो नहीं भेजा।
मेनका – हाहाहाहा! विश्वामित्र, चरित्र बुढ़ापे की चादर है, जवानी को इसकी जरुरत नहीं। और मैं तो चिरकाल तक योवन की मालिक रहूंगी।
विश्वामित्र – तो ये कैसा योवन है तुम्हारा मेनका? तुम इस योवन से अपने प्रेमी की प्यास भी नहीं मिटा सकती। जो कभी भटकता हुआ अहिल्या तो कभी दस्यु-सुंदरियों की चरणो में लेटता है. वो तुम्हे नाचता तो जरूर है मेनका, लेकिन वो अधिकार नहीं देता जो देवी शुचि को प्राप्त है.
मेनका-ये चरित्र, ये अधिकार, ये गौरव मिथ्या शब्द हैं तुम जैसे हारे हुए पुरुष ढाल बना लेते हैं अपनी नपुंसकता छुपाने के लिए. जिनके योवन में आकर्षण नहीं, जो प्यास नहीं जगा सकती, वैसी नारियां ही ये धारण करती हैं. चरित्र कभी भी स्त्रियों का आभूषण नहीं रहा. तुम जिसे चरित्रहीनता समझते हो, वो तो स्त्रियों का असली आभूषण है. अगर हम ऐसा नहीं करे तो फिर क्या हमारा योवन। भोग पुरुषों के लिए पाप के रूप में वर्णित हैं वेदों में, हम स्त्रियों के लिए नहीं।
मेनका – विश्वामित्र, मैं तुम्हे उस सुख सुविधा के लिए तो नहीं छोड़ रही, ना ही अमरत्व के लिए स्वयं से इंद्रा के पास जा रही हूँ. मैं तुम्हे छोड़ रही हूँ क्यों की इंद्रा मुझे चाहने लगे हैं. मैं तुम्हे पहले दिन ही छोड़ देती अगर उन्हें मेरी याद आती. मैं इतने दिन तुम्हारे साथ रही, ये मेरा प्रेम नहीं था. ये तो तुम्हारी अज्ञानता हैं, तुमने मेरे मन को कभी समझा ही नहीं की. तुम तो मेरा शोषण करते रहे, मेरा वलात्कार करते रहे.
विश्वामित्र – मेनका!!!
मेनका – हाँ विश्वामित्र, तुमने मेरा वलात्कार किया है इतने साल, हर एक रात, हर एक पल. और तुम कैसे सोच रहे हो की मैं, एक स्त्री, एक वलात्कारी के साथ रहूंगी। मैं तो तुम्हे छोड़ देती अगर वशिष्ठ मुझे चाहते, क्यों की वो ही धरती पे तुमसे श्रेष्ठ हैं.
विश्वामित्र – तो क्या प्रेम सिर्फ श्रेष्ठ आभूषण की चाहत हैं.
मेनका – हा हा !! विश्वामित्र, तुम कभी ज्ञानी नहीं हो सकते। मैं तो कल इंद्रा को भी छोड़ दूँ अगर नारायण, महादेव या ब्रम्हदेव मुझे चाहने लगे. और मुझे इंद्रा इसलिए पसंद है की वो मुझे तुम्हारी तरह, प्रेम-प्रेम कह कर नहीं रोकेगा। वो तो खुश रहेगा ये सोच कर की कुछ पल तो आंनद के मिले।

परमीत सिंह धुरंधर