अनवरत पथिक


वो चला और चलता गया,
वो छला, बार-बार छला गया,
पर बिना रुके, बिना मुड़े,
वो काँटों पे निरंतर बढ़ता गया।
हर राह में थे अंधेरे घने,
हर मोड़ पे थे सपने उसे छलते,
कभी अपनों ने रोका राह में,
कभी परायों ने फेंके ताने।
कभी धूप ने जलाया, कभी बारिश ने भिगोया,
कभी उम्मीदें चुप थीं, कभी आवाज़ डरी,
मगर उसके पाँव थमे नहीं,
उसके इरादों ने हार मानी नहीं।
उसकी आँखों में था उजाला,
हर दुख में वो रहा अकेला,
वो टूटा नहीं, झुका नहीं,
वो सच्चाई से कभी हटा नहीं।
हर ज़ख्म ने उसको निखारा,
हर ठोकर ने राह सँवारा,
वो पत्थरों से लड़ता गया,
हर दर्द को शब्दों में गढ़ता गया।
ना था उसके पास कोई सहारा,
ना किस्मत ने दिया कोई किनारा,
पर उसके भीतर थी एक ज्वाला,
जो हर रात में देखता एक नया सवेरा था।
वो गिरा, तो खुद उठ खड़ा हुआ,
अपने आँसुओं से खुद ही बड़ा हुआ,
ना थकना उसे मंज़ूर था,
ना रुकना कभी दस्तूर था।
हर हार को उसने गीत बना डाला,
हर चुप्पी को उसने शोर बना डाला,
वो एक जलती लौ बन गया,
जो आँधियों में भी जलता गया।
वो बस चलता ही गया,
ज़िंदगी से लड़ता गया,
छल, चोट, कांटे, आँधियाँ —
हर बाधा पे चढ़ता
वो आगे बढ़ता गया।

He walked, and kept walking still,
He was betrayed, again against his will.
Yet without pause, without turning back,
He kept advancing on a path full of thorns and lack.

In every direction, shadows loomed,
At each bend, false dreams bloomed.
Sometimes his own held him back in fear,
Sometimes strangers threw taunts to sneer.

The sun scorched him, the rains soaked his frame,
Hope went silent, and even his voice felt shame.
Yet his feet refused to stop or stall,
His willpower never let him fall.

There was light inside his eyes,
Even in pain, he stood and tried.
He never broke, never bent low,
Never strayed from truth’s glow.

Each wound refined him like fire,
Each stumble carved a path higher.
He battled stones with silent might,
And shaped each pain into verses of light.

He had no support to hold,
No destiny to anchor or mold.
But within him burned a fierce flame,
That lit each night with a dawn to reclaim.

If he fell, he rose alone,
With tears he carved a strength of his own.
He accepted no rest, no delay,
Nor allowed himself to lose his way.

He turned each loss into a song,
Each silence into a cry so strong.
He became a flame that refused to die,
Even when storms darkened the sky.

He just kept walking on,
Fighting life till the pain was gone.
Betrayal, wounds, thorns, or gale—
He climbed each barrier,
And blazed his trail.

This Hindi poem written by me is a tribute to the strength, resilience, and unbreakable spirit of a person who continues to move forward despite being deceived, hurt, and abandoned. Faced with darkness, betrayal, and solitude, the protagonist never gives up. He turns every wound into wisdom, every fall into a rise, and every silence into a roar. With no external support or favorable fate, it is his inner fire that lights the way. The poem inspires readers to embrace perseverance and courage, reminding them that even in the face of life’s harshest trials, progress is possible—one unyielding step at a time.

RSD

You Are Time Incarnate


तू सुबह की उषा नहीं, तू शाम की शुधा नहीं,
समय भी है तेरे गोद में, तेरे बिना कोई दिशा नहीं।
तू स्वयं शिव की शक्ति है, तू अभय, तू भाल है,
तू नारी नहीं केवल, तू स्वयं-साक्षात् काल है।
तेरे कदम से काँप उठे, धरती और आकाश,
तेरे नयन में चमकता है, संहारों का प्रकाश।
तू यम की गति से भी तीव्र, तू प्रलय की चाल है,
तेरे उठे हुए कर में छुपा नवविश्व का जाल है।

तू सृष्टि की पहली हूक है, तू ही आदि-अनंत की अनुगूंज,
तेरे ही स्पर्श से पिघले पाषाण, जागे मौन ऋषियों में तरंग।
तू ध्वंस की देवी भी, तू ही नवजीवन का मूल,
तेरे भीतर छुपा हुआ सारा ब्रह्मांड का उसूल।
तू बंधन नहीं, तू मुक्ति है, तू सबसे ऊँची सोच,
तू बिन बोले समझ सके जो, वो मौन की भी लोच।
तू नर्मी की मिसाल भी, तू क्रांति की मशाल है,
तू नारी नहीं केवल, तू स्वयं साक्षात् काल है।

तू जल की लहरों में गीत, तू पर्वत की पुकार,
तू वन की निस्वास में बसी हर जीव की पुकार।
तू अम्बा है, तू अन्नपूर्णा, तू काली, दुर्गा, रागिनी,
तू मीरा की तान है, तू खुद तुलसी की वाणी।
न तुझमें कोई हीनता, न तुझमें कोई भार,
तू देह नहीं, तू ध्येय है, तू गूढ़तम सवाल है,
पाने को तुझे स्वयं बसंत भी बेताब है.
तू नारी नहीं केवल, तू स्वयं साक्षात् काल है।

तू जीवन की धुन भी है, तू मरण का राग है,
तू ही तो है अग्नि-ज्वाला, तू ही मधुमास है।
तेरे अंगों की सरसता में अमृत-सी मिठास है.
जिसे जग कहे अबला, वो शक्ति का सवाल है,
तेरे भीतर छुपी हुई सृष्टि की हर चाल है।
तू मात्र एक देह नहीं, तू ब्रह्म की मशाल है,
तेरे भीतर झिलमिलाता एक विराट सवाल है।
तू नारी नहीं केवल, तू स्वयं साक्षात् काल है।

You are not the dawn’s gentle light, nor the twilight’s graceful glow,
Time itself rests in your lap—without you, there is no path to follow.
You are the power of Shiva, fearless and sublime,
You are not merely a woman—you are Time, the end of time.

At your steps the earth and sky tremble with awe,
In your eyes flickers the blaze that devours all.
Swifter than the march of death, you stride like the final gale,
In your raised hand, the threads of a newborn universe sail.

You are the first cry of creation, the echo of beginning and end,
Your touch melts stone, your silence awakens sages again.
You are destruction’s goddess and the seed of life anew,
Within you lies the universe’s core, eternal and true.
You are no chain, you are release—thought beyond all reach,
You grasp the unspoken, the silence even words cannot breach.
A symbol of gentleness, yet the torch of revolution’s flame,
You are not merely a woman—you are Time, with no name.

You are the song of the river, the cry of the mountain high,
You dwell in the forest’s breath, in every creature’s sigh.
You are Amba, Annapurna, Kali, Durga, and melody’s thread,
You are Meera’s longing, Tulsidas’ words so widely spread.
No inferiority in you, no burden to bear,
You are not just flesh—you are the purpose, deep and rare.
Even Spring yearns to embrace your grace and flame,
You are not merely a woman—you are Time, untamed.

You are life’s melody, death’s sacred tune,
You are fire’s blaze and the sweetness of June.
In your essence flows the nectar of divine delight,
What the world calls “weak,” holds power’s height.
The movements of creation within you reside,
You are not just a body—you are Brahma’s light.
In your soul flickers a question vast and bold,
You are not merely a woman—you are Time, manifold.

This poem is a tribute to the divine and cosmic essence of womanhood. It elevates the feminine identity beyond societal roles, celebrating women as the source of creation, transformation, and liberation. Drawing upon Hindu mythology and spiritual metaphors, the poem portrays women as embodiments of Time itself—fearless, nurturing, destructive, creative, intuitive, and transcendent. It rejects the label of weakness (“abala”) and redefines woman as the source of all strength, the holder of ancient mysteries, and the flame that guides the universe.

RSD

टाटा उ त रतन रहलन देश आ बिहार के


टाटा उ त रतन रहलन देश आ बिहार के -२
जेकरा से भी मिललन, मिललन आपन जान के.
जे कोई भी गइल दर्द लेके उनकरा पास में-२
बैठे के कुर्सी देलन पाछे, ले लन पहिले दर्द बाँट के.

जन-जन के आँख में आंसू आइल इ समाचार पे
तनी और उमरिया देतन भगवान् अइसन लाल के.
टाटा उ त रतन रहलन देश आ बिहार के -२
जेकरा से भी मिललन, मिललन आपन जान के.

टाटा नैनो लेके अइलन भारत के आपन शान पे
हार में भी जीत होला, खून ह ई चौहान के.
टाटा उ त रतन रहलन देश आ बिहार के -२
जेकरा से भी मिललन, मिललन आपन जान के.

दूर -दूर तक केहू नइखे आगे-पीछे राह में
का अम्बानी-का महिंद्रा, बिरला भी बारां नाट रे.
टाटा उ त रतन रहलन देश आ बिहार के -२
जेकरा से भी मिललन, मिललन आपन जान के.

कइलन काम बड़का-बड़का बिना फोकस झार के.
एगो रहलन विजय माल्या, गैलन मुँह के ढांक के.
टाटा उ त रतन रहलन देश आ बिहार के -२
जेकरा से भी मिललन, मिललन आपन जान के.

विवाह से ज्यादा मजा बाते तनहा रात में
अनुशासन में बाँध ल अइसन, दुनिया कही भगवान् रे.
टाटा उ त रतन रहलन देश आ बिहार के -२
जेकरा से भी मिललन, मिललन आपन जान के.

सूरज डूब जाइ त का ना होइ बिहान आज से?
अनुशासन में बाँध ल अइसन, दुनिया कही भगवान् रे.
पियलन शिव जी जब विष के प्याला, हरि कइलन प्रणाम रे.
का बिगारी अब कोई, जब भोलेनाथ बारन साथ में.

टाटा उ त रतन रहलन देश आ बिहार के -२
जेकरा से भी मिललन, मिललन आपन जान के.
जे कोई भी गइल दर्द लेके उनकरा पास में-२
बैठे के कुर्सी देलन पाछे, ले लन पहिले दर्द बाँट के.

RSD

मेरे देश की धरती


मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे – मोती
मेरे देश की धरती।
सींचे जिसको गंगा-जमुना, और कावेरी लहराती
मेरे देश की धरती।
जहाँ पतली कमर तरकस सी, नैनों से बाण चलाती
मेरे देश की धरती।
माँ के तन पे फटी है साड़ी, फिर भी माँ मुस्काती
मेरे देश की धरती।
पूजते हैं बैल – गोरु, और गाय रोटी पहली खाती
मेरे देश की धरती।
भयभीत होकर जहाँ से लौटा सिकंदर, ऐसी बिहारी छाती
मेरे देश की धरती।
जहाँ नानक-कबीर के दोहों को, दादी-नानी हैं गाती
मेरे देश की धरती।
जहाँ पग-पग पे प्रेम मिले, पल-पल में मिले थाती
मेरे देश की धरती।
सौ पुश्तों तक लड़े शिशोदिया, रंगने को बस माटी
मेरे देश की धरती।
जहाँ धूल में भी फूल खिले, पत्थर नारी बन जाती
मेरे देश की धरती।
सर्वश्व दान करके, बन गए भोलेनाथ त्रिलोकी
मेरे देश की धरती।
पिता के मान पे श्रीराम ने कर दी गद्दी खाली
मेरे देश की धरती।
भगीरथ के एक पुकार पे, स्वर्ग से गंगा उतरी
मेरे देश की धरती।

मिट गए हूण टकरा के स्कंदगुप्त से, किनारो पे लहरे मिटती
मेरे देश की धरती।
जहाँ हर दिल में गणपति, और नित्य होती उनकी आरती
मेरे देश की धरती।
इस मिटटी की यही बात है यारों, यहाँ मिट जाती हर दूरी
मेरे देश की धरती।
काँधे पे जहाँ हल शोभित और हाथों पे चमकती राखी
मेरे देश की धरती।
खेत-खलिहान, बँसवारी से पनघट, नैनों से नैन लड़ाती
मेरे देश की धरती।
पतली-कमर, बाली-उम्र, डगर-डगर, चढ़ती जवानी, इठलाती
मेरे देश की धरती।
कितना लिखूं,लिखता रहूं, खुशबू फिर भी नहीं मिटती?
मेरे देश की धरती।

RSD

आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय-2


चोरी की सजा काट कर
मैं बाहर निकला।
घंटों रुक -रुक कर
कभी सूर्य
कभी पक्षियों के समूह गान को
सुन रहा था.
कोई जल्दी नहीं थी
कहीं जाने की.
एक चौराहे पे देखा
वही न्याय की देवियाँ विराजमान थीं
कुछ बोल रहीं थी.
मैंने सुना
वो आज की भारत में
नारियों के अधिकार पे बोल रही थीं.
वो बता रह थी
पुरुष अपनी मानसिकता नहीं बदल रहा
इसलिए ये बलात्कार
ये नारियों का शारीरिक शोषण
आधुनिक भारत में नहीं रुक रहा.
एक अकेली नारी को देख
ये पुरुष ऐसे टूट पड़ते हैं
जैसे निरीह गाय पे सिंहों का झुण्ड।
……
हर चौराहे पे ये ही हो रहा था
भारत की नारियाँ
अपनी सुरक्षा
समानता
अपने हक़ के लिए सड़कों पे
अपनी आवाज उठा रही थी.
वो रो रही थीं
वो सत्कार कर रही थीं
भूख हड़ताल
आमरण -अनशन
और जंतर-मंतर पे प्रदर्शन कर रही थीं.
वो न्याय की देवियाँ होकर
अपनी किसी बहन के लिए
न्याय मांग रही थी.
और ये क्या?
वो जिस बहन के लिए
न्याय मांग रही थी
विलाप कर रही थीं
वो कोई और नहीं
वो वही कुलटा थी
जिसे इन्हीं देवियों ने
मेरे साथ उस दिन न्यायलय में दंड दिया था.
…….
और मैं स्तब्ध
देख रहा था
मगध के नन्द साम्राज्य और उसके
धनानंद को
जो अपने उत्कर्ष पे था.
……

परमीत सिंह धुरंधर

आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय


मैंने कहा, “मैं चोर नहीं हूँ.”
न्याय की कुर्सी से आवाज आई
तुम ही चोर हो.
उन कुर्सियों पे बैठी थी नारियाँ
न्याय की देवियाँ
और उनके पीछे खड़े थे, पुरुष।
……
और मैंने देखा
न्याय की देवियों की आँखे
देख रही थीं नफ़रत से
मेरे सर पे तितर-बितर बाल को
चिपटे – नाक को
मोटे-भद्दे, बाहर निकले मेरे होंठ को
और मेरे काले कुरूप काया को.
……
बेड़ियों में जकड़ा मैं
देख रहा था
ब्रिटिश-सम्राज्यवाद के न्याय को
जो अपने उत्कर्ष पे था.
……
अंत में कटघरे में लायी गयी
एक सुन्दर सी नारी
जिसका मुख
सूर्य की किरणों सा दिव्या था
और वक्ष
हिमालय सा उन्नत।
बिना उसके शब्दों को सुने
न्याय की देवियों ने
एक स्वर में कहा, “ये ही कुलटा है.”
इसने ही अपने अंगों की मादाकता
और अपने नयनों की चंचलता
अपने यौवन की मधुरता
से उस भीड़ को उकसाया था.
जैसे कोई किसान
स्वछंद चरते किसी पशु को
कोई बालक
शांत बैठे मधुमखियों को
उकसाता है.
अतः, इसका अपराध
शास्त्रों के अनुसार
निंदनीय नहीं, दण्डनीय है.
……
और मैं स्तब्ध
देख रहा था
वैशाली के गणराज्य को
गणतंत्र को
जो अपने उत्कर्ष पे था
……..

परमीत सिंह धुरंधर

फिर बिहार देखिये


शहर देखिये, सुलतान देखिये,
अगर इतिहास देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

शर्म देखिये, सौंदर्य देखिये,
अगर यौवन देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

बलवान देखिये, पहलवान देखिये,
अगर पौरष देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

कलियाँ देखिये, कांटे देखिये,
अगर फूल देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

मुंबई देखिये, दिल्ली देखिये,
अगर किसान देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

काश्मीर देखिये, कन्याकुमारी देखिये,
अगर भारत देखना है तो,
फिर बिहार देखिये।

गीता पढ़िए, कुरान पढ़िए,
अगर इंसानियत पढ़नी है तो,
फिर बिहार देखिये।

नेहरू पढ़िए, गांधी पढ़िए,
देश को जानना है तो,
फिर राजेंद्र बाबू पढ़िए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

लड़की वो थी केरला की


लड़की वो थी केरला की,
कर गयी हमसे चालाकी।
आँखों से पिलाया हमको,
और बाँध गयी फिर राखी।

लड़की वो थी पंजाब की,
पूरी – की – पूरी शहद में लिपटी।
बड़े – बड़े सपने दिखलायें,
और फिर बोल गयी हमें भैया जी.

लड़की वो थी बंगाल की,
कमर तक झुलाती थी चोटी।
शरतचंद्र के सारे उपन्यास पढ़ गई,
सर रख के मेरे काँधे पे.
और आखिरी पन्ने पे बोली,
तय हो गयी है उसकी शादी जी.

लड़की वो थी हरियाना की,
चुस्त – मुस्त और छरहरी सी.
हाथों से खिलाती थी,
बोलके मुझको बेबी – बेबी,
और बना लिया किसी और को,
अपना हब्बी जी.

लड़की वो थी दिल्ली की,
बिलकुल कड़क सर्दी सी.
लेकर मुझसे कंगन और झुमका,
बस छोड़ गयी मेरे नाम एक चिठ्ठी जी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Had Adi Shankara an idea of modern Pakistan and Bangladesh?


In his life, Adi Shankara travelled within Indian subcontinent to teach the philosophy of Advaita Vedanta. He even went to Benaras and then Mithilanchal (Bihar) to defeat Mandal Mishra. Adi Shankara established four mathas at Davarka, Jagnaath Puri in Orissa, Sringeri in Karnatka and in Badrinaath in Utrakhand. Even if there is debate whether he established these mathas or inherited from others, there are no sources claiming he tired to establish or inherit any such mathas in the area of modern Pakistan, Bangladesh, and any other part of old India. During his time (8th century CE), Arab had reached and established in Sindh, but still these regions were ruled by Rajput (the Soomra dynasty 1024-1351) for along time. Even Mahmud of Ghazni defeated the Kabul Sahi dynasty in 1011 CE. Therefore, it is surprising that why Adi Shankara did not travel to the modern Pakistan or Bangladesh to establish such Mathas even if there are 5 Shakti Pithas in Bangladesh, 3 in Nepal, one in Pakistand, one in Tibbet and one in Srilanka.
So, it suggests that Adi Shankara had an idea of the division of India into modern India, Pakistan and Bangladesh.

 

Parmit Singh Dhurandhar

15 ऑगस्त


मैं 15 ऑगस्त को याद करता हूँ,
बाबा नागार्जुन को और गाता हूँ “आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,”
क्यों की और कोई गान मुझे आजादी और गुलामी का भेद नहीं बताता।
महाराणा प्रताप को,
क्यों की मैं अकबर को महान नहीं मानता।
सिरोजदौला, टीपू सुलतान और असफाक को,
क्यों की मैं धर्मनिरपेक्षता को नहीं मानता।
हिमायूं को,
क्यों की मैं उसे मुग़ल नहीं मानता।
राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल को,
क्यों की उनसे बड़ा बुद्धिजीवी कोई मुझे नहीं दिखता।
अजबदेह, पद्मावती, जीजाबाई को,
क्यों की मैं स्त्री को सम्मान देना नहीं जानता।
लाल बहादुर और इंदिरा गांधी को,
क्यों की मैं उनसे बड़ा नेता किसी को नहीं मानता।
राम मनोहर लोहिया को,
क्यों की जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रान्ति को सम्पूर्ण नहीं मानता।
और अंत में श्यामा प्रसाद मुख़र्जी और उनकी रोती हुई माँ को,
क्यों की भारत वर्ष में केवल एक नाथूराम हुआ है और केवल एक महात्मा की ह्त्या हुई है, मैं इसे नहीं मानता।

परमीत सिंह धुरंधर