आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय-2


चोरी की सजा काट कर
मैं बाहर निकला।
घंटों रुक -रुक कर
कभी सूर्य
कभी पक्षियों के समूह गान को
सुन रहा था.
कोई जल्दी नहीं थी
कहीं जाने की.
एक चौराहे पे देखा
वही न्याय की देवियाँ विराजमान थीं
कुछ बोल रहीं थी.
मैंने सुना
वो आज की भारत में
नारियों के अधिकार पे बोल रही थीं.
वो बता रह थी
पुरुष अपनी मानसिकता नहीं बदल रहा
इसलिए ये बलात्कार
ये नारियों का शारीरिक शोषण
आधुनिक भारत में नहीं रुक रहा.
एक अकेली नारी को देख
ये पुरुष ऐसे टूट पड़ते हैं
जैसे निरीह गाय पे सिंहों का झुण्ड।
……
हर चौराहे पे ये ही हो रहा था
भारत की नारियाँ
अपनी सुरक्षा
समानता
अपने हक़ के लिए सड़कों पे
अपनी आवाज उठा रही थी.
वो रो रही थीं
वो सत्कार कर रही थीं
भूख हड़ताल
आमरण -अनशन
और जंतर-मंतर पे प्रदर्शन कर रही थीं.
वो न्याय की देवियाँ होकर
अपनी किसी बहन के लिए
न्याय मांग रही थी.
और ये क्या?
वो जिस बहन के लिए
न्याय मांग रही थी
विलाप कर रही थीं
वो कोई और नहीं
वो वही कुलटा थी
जिसे इन्हीं देवियों ने
मेरे साथ उस दिन न्यायलय में दंड दिया था.
…….
और मैं स्तब्ध
देख रहा था
मगध के नन्द साम्राज्य और उसके
धनानंद को
जो अपने उत्कर्ष पे था.
……

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


खूबसूरत जाल फैलाने पर,
फंसता हर मर्द है.
मगर चाँद सिक्के उछल कर देखो,
फिर हुस्न कैसे बदलता रंग है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हमने कबूतरों को छोड़ दिया है


हमने कबूतरों को छोड़ दिया है,
उड़ाना अब छज्जे से.
डोली उनकी उठ गयी,
अब क्या रखा है मोहल्ले में?
मेरा सारा प्रेम-रस ले कर,
वो सींच रही बाग़ किसी का.
हुस्न का ये रंग देख कर,
उचट गया है मन जीने से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चुनाव


मैंने लिखी जो कबिता वो तुम्हारे हुस्न पे थी,
उसने लिखी जो कबिता वो तुम्हारे जिस्म पे थी.
और, तुमने चुन लिया उसे ही,
जिसकी नजर तुम्हारे जिस्म पे थी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न वालों को बस छावं ढूंढते देखा है


मोहब्बत भले न मिली जिंदगी में,
नफरतों ने मुझे आगे बढ़ने का मुद्दा दिया है.
जमाना कर रहा है कसरते मुझे मिटाने की,
मेरी साँसों ने तो बस मुझे जिन्दा रखा है.
किसने कहा की हुस्न के आँचल में जन्नतों का द्वीप है,
हमने तो बस यहाँ साँसों को सिसकते देखा है.
रातों के अँधेरे में तो वफ़ा हर कोई निभा दें,
दिन की चिलचिलाती लू में,
हमने हुस्न वालों को बस छावं ढूंढते देखा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न-इश्क़ और खंजर


खूबसूरत लम्हों में लपेट के जो खंजर चला दे,
वो हुस्न तेरा है.
बिना जुल्फों में सोएं जो ओठों का जाम चख ले,
वो इश्क़ है मेरा।
तुझे गुरुर है जिस योवन पे,
वो ढल जाएगा एक दिन सदा के लिए,
और मैं यूँ हैं चखता रहूँगा योवन का रस,
चाहे रौशनी मेरी आँखों की या आँखे मेरी,
मुद जाए सदा के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

व्रह्मचर्य


एक बार टूटा दिल मेरा ऐसे,
अब सौ भुजंगों का विष सह लूँ.
नारी के प्रेम से अच्छा है,
मैं शिव सा विषपान कर लूँ.
छल रहीं हैं सारी सृष्टि को,
जाने कब से अपने प्रेम में.
इनके सौंदर्य को निहारने से अच्छा है,
मैं लक्ष्मण सा पर्ितयाग कर दूँ.
बस दिखावा है इनका दम्भ,
अपने चरित्र के मान का.
इनको अपना बनाने से अच्छा है,
मैं शुक सा व्रह्मचर्य धारण कर लूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

खूबसूरत लड़कियां : मगरमच्छ के आंसू से बन्दर फंसाती है


खूबसूरत लड़कियां एक जाल बिछाती हैं,
मगरमच्छ के आंसू से बन्दर फंसाती है.
पुरुष-प्रधान समाज से इनको है शिकायत,
मगर अपने डैड को परफेक्ट मैन बताती हैं.
नारी के अधिकार पे स्वतंत्र विचार रखने वाली,
ये अपने भाई के प्रेमिका को चुड़ैल बताती हैं.
इन्हे पसंद हैं रहना खुले आसमान के तले,
घोंसलों को बनाना इनके अरमान नहीं,
मगर तीस तक पहुँचते – पहुँचते,
ये शादी – शादी और सिर्फ शादी चिल्लाती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

खेल


ये इश्क़ – मोहब्ब्बत क्या है,
बस दो जिस्म का खेल.
हम खेले तो धोखा,
और वो खेले तो प्रेम।
वो छोड़े,
तो हम में ही कुछ कमी है,
और हम छोड़ दें,
तो हमें नहीं है उनकी क़द्र।

परमीत सिंह धुरंधर

विश्वामित्र और मेनका


मुझे कोई उपेक्षा नहीं,
की तुम सीता – सावित्री बन के रहो,
मगर ये भी तो कहो,
जब कह ही रही हो खुद ही,
की अब तक कितनो को,
सीता – सावित्री बनके छला है.
मैं उन पंडितों में नहीं जिन्हे बस,
विश्वामित्र का दम्भ ही दिखा है,
मैं वो पंडित हूँ,
जिसकी कलम ने हमेसा,
मेनका को बस चरितहीन ही लिखा है.
भूख से बिलखते बच्चे को जिसने छोड़ा,
बस इंद्रा और सवर्ग के चाह में,
लिखते रहे सब उसको बस नारी की विवसता,
मैंने उसको बस व्याभिचार ही लिखा है.

परमीत सिंह धुरंधर