लडकियां बस अपने आशिकों की मौत चाहती हैं,
उनके आंसू, उनके दुःख और उनकी लावारिस लाश चाहती हैं.
शान से कहती हैं की उनको सती – सावित्री ना समझें,
मगर सती – सावित्री होने का फिर भी ढोंग करती हैं.
शादी के मन्त्रों पे हंसने वाली हर लड़की,
तीस के बाद शादी के महत्त्व की बात करती है.
और वो लौटा रहीं हैं एक – एक करके अपने पुरस्कारों को,
जिस दहसतगर्दी के खिलाफ एक जुट हो कर,
उन्ही दहसतगर्दीयों को, अपनी जवानी में,
अपने आँचल में शयन-सुख प्रदान करती हैं.
लडकियां बस अपने आशिकों की मौत चाहती हैं,
उनके आंसू, उनके दुःख और उनकी लावारिस लाश चाहती हैं.
परमीत सिंह धुरंधर