लक्ष्मण


बिना तुम्हारे राम कुछ नहीं,
बिना तुम्हारे सीता की चाह नहीं,
बिना तुम्हारे अवध ही क्या,
अब ये ब्रह्माण्ड भी मेरा नहीं।
मैं नैनों को भींच लूंगा,
सीता को भी छोड़ दूंगा,
जीवन को सीचने वाला मैं,
अब सबका जीवन सोंख लूंगा।
बिना तुम्हारे सम्बन्ध नहीं,
बिना तुम्हारे कोई शौर्य नहीं,
बिना तुम्हारे राम नहीं,
और धुरंधर सिंह मेरा कोई धर्म नहीं।

परशुराम -लक्ष्मण


मैं राम नहीं,
की श्र्वन करूँ।
परिणाम का चिंतन,
मनन करूँ।
मैं तीरों का अभिलाषी हूँ,
फिर परशु से क्या डरु.
मैं अहंकारी नहीं,
की शान करूँ।
जीवन का अपने,
गुणगान करूँ।
मैं रघुबंसी रामपथगामी,
बस राम का गुणगान करूँ।
नाम में मेरे क्या रखा है.
वीर पल नहीं गवाते विवाद में.
लक्ष्मण के रहते,
धुरंधर राम आएं,
रण में,
ऐसी हमारी मर्यादा नहीं।