मोहब्बत में उनके अर्ज किया था,
की जान तक अपनी लूटा देंगे।
हसरते उनकी भी कम जवाँ न थीं,
बर्बाद ही करके छोड़ेंगे।
मोहब्बत कुछ ऐसे बढ़ी अपनी,
की जमाना तक दुश्मन हो गया.
पता भी हमें तब चला, जब उनकी,
डोली उठा कोई और ले गया.
परमीत सिंह धुरंधर
These are just related to life as philosophy.
मोहब्बत में उनके अर्ज किया था,
की जान तक अपनी लूटा देंगे।
हसरते उनकी भी कम जवाँ न थीं,
बर्बाद ही करके छोड़ेंगे।
मोहब्बत कुछ ऐसे बढ़ी अपनी,
की जमाना तक दुश्मन हो गया.
पता भी हमें तब चला, जब उनकी,
डोली उठा कोई और ले गया.
परमीत सिंह धुरंधर
बचपन में त्योहारों की, जवानी में ललकारों की,
और बुढ़ापे में सहारों की जरूरतें होती हैं सभी को.
परमीत सिंह धुरंधर
मुझे हर रिश्ता पसंद है तेरी आँखों से होकर,
आ जुल्म-सितम सब सह लें, हम एक धागे में बंध के.
परमीत सिंह धुरंधर
यूँ ही धरा पे ये भीषण ठंड रहे,
और तू यूँ ही मेरी बाहों में सिमटती रहे.
तेरी साँसे जीवित रखें मेरी नसों को,
यूँ ही मेरे रुधिर को गर्मी देती रहें।
मेरी पलकों पे तेरी ओठो का भार रहे,
बस एक रात ही सही सोनिये,
तेरी अधरें मेरी अधरों का आधार बनें।
ऐसे फिर रसपान करता रहूँ रात भर,
की जीवन भर गुमान रहे.
परमीत सिंह धुरंधर
जंग तो होगी,
चाहे पूरी दुनिया एक तरफ,
और मैं अकेला ही सही.
नूरे – धुरंधर हूँ मैं,
पीछे हटने का सवाल ही नहीं।
मौत का भय मुझे क्या दिखा रहे हो,
लाखो दर्द में भी जो मुस्कराता रहा,
खून उसका हूँ मैं,
झुकने का सवाल ही नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
मैं घनघोर विरोधी हूँ,
चक्रवात सा.
मेरी प्रखरता,
है आज भी एक विवाद हाँ.
ना रोक सके न तोड़ सके,
ना मोड़ सके कोई.
इसलिए कहते हैं सभी की,
मेरा होगा बुरा अंजाम हाँ.
परमीत सिंह धुरंधर
यूँ ही उलझनों में,
उलझते – उलझते,
सुलझाई है मैंने जिंदगी।
उनको नाज है की वो,
महफ़िलों की चाँद हैं.
मगर मैंने आज भी अंधेरों में,
जलाये राखी है ये रौशनी।
परमीत सिंह धुरंधर
सारे रिश्ते खामोस हो गए,
हम किसी राह पे,
वो किसी राह के मुसाफिर हो गए.
न कोई खबर, न इल्तिजा,
हम तो तन्हा ही हैं,
पर सुना है,
उनके लाखों रिश्तेदार हो गए.
परमीत सिंह धुरंधर
If you cannot be a word in a sentence, try to be a comma or a full stop. However, do not be a part of substitution.
Parmit Singh Dhurandhar
जब प्रेम प्यास बन जाए,
तो दाल 250 रूपये किलो मिले,
या फिर 950 रूपये किलो मिले,
क्या फर्क पड़ता है?
तो अपना – अपना प्रेम सम्भालो दोस्तों,
मैं आज तक रोता हूँ, बस एक उनको खोकर।
दाल गलती है, एक दिन सबकी गल जायेगी,
दाल के चक्कर में भात ना गवाना दोस्तों।
भथुआ पे भात खाओ, तीसी पे भात खावों,
रोटी है तो थोड़ा साग भी साथ खाओ.
बस दाम बढ़ा है, कोई अकाल नहीं है यह,
की दाल के चक्कर में रात न गवाना दोस्तों।
मैं आज तक रोता हूँ, बस एक रात गवाकर।
जब अधरों पे प्यास जग जाए,
तो जाम बेवफाई का हो,
या वफ़ा का,
क्या फर्क पड़ता है?
तो अपना – अपना प्रेम सम्भालो दोस्तों,
मैं आज तक रोता हूँ, बस एक जाम ठुकराकर।
परमीत सिंह धुरंधर