चादर


दर्पण को कैसे निहारूं,
उनपे वो रंग अब तक है.
जो दे गए थे तुम,
वो जखम, दर्द एक साथ सब संग.
कोई रिस्ता नहीं गढ़ पाती,
वो तेरी चादर एक बुनकर,
जिस पे सोये थे तुम कभी,
साँसों के समुन्दर में बहकर मेरे संग.

परमीत सिंह धुरंधर

चौसा – लंगड़ा


रसों का शौकीन मैं भी,
रसों का शौकीन तू भी.
बरसो हुए वो माटी छूटा,
बरसो हुए वो पानी मिला,
तो बता ये बंधू,
कैसे लाऊँ रस वही.
चौसा – लंगड़ा पे,
चटकारती मेरी जीभ,
अब तक प्यासी है,
फिर उसी स्वाद को.
तो बता ये बंधू,
कैसे लाऊँ रस वही.

परमीत सिंह धुरंधर

नयापन


एक नयापन,
जीवन में लेकर जो तुम आई हो.
मेरे सागर के खाड़ेपन को,
हर पल में हरती हो.
मेरे अंबर के सूनेपन पे,
तुम चाँद सी जब खिली हो ,
फिर जीवन में मेरे क्या कमी है.

परमीत सिंह धुरंधर

संघर्ष और चाहत


संघर्ष ही जीवन का मिठास है, दोस्तों,
हर नदिया प्यासी, सागर के खाड़ेपन को.
चकोर की चाहत वो चाँद दूर का,
जिसके आँगन में सितारे और दामन में कई दाग हैं।

परमीत सिंह धुरंधर

विजय श्री


मैं सागर की लहरों,
को बाँध के पी जाऊं।
मगर मेरी प्यास,
तेरे अधरों से बुझती है प्रिये।
मैं हिमालय के मस्तक पे, एक ही बार में,
अपने विजय का ध्वज लहराऊं।
पर विजय श्री,
तुम्हारे बाहों में मिलती है प्रिये।
मैं बादलों को रोक कर,
सावन को बरसा दूँ।
मगर भिगनें का मज़ा,
तेरी जुल्फों में है प्रिये।
मैं पुष्पों को चुम कर,
भौरां बन जाऊं।
मगर मैं झूमता तेरी वक्षों पे हूँ प्रिये।
तू ही मुझे पूर्ण करती है,
तू ही मुझे सम्पूर्ण करती है।
तुझसे मिल कर ही,
मुझे जिंदगी मिली है प्रिये।

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे साहस की सहचारिणी


तुम ह्रदय की स्वामिनी,
धमनियों की रागिनी,
नस – नस का मेरे स्पंदन हो,
तुम हो मेरे मन की कामिनी।
चक्षुओं की मेरी रौशनी,
मेरे अधरों पे प्रज्जवलित अग्नि,
मेरे साँसों की ऊष्मा हो,
तुम हो मेरे साहस की सहचारिणी।

परमीत सिंह धुरंधर

रस


मैं रौंदत्ता हूँ और मैं रौंदूँगा,
मुझे जीत – हार का भय नहीं।
युद्ध किया है और करता रहूँगा,
मुझे विध्वंश का डर नहीं।
मैं नदिया नहीं जो राहे मोड़ लूँ,
न सागर हूँ, जो किनारों से बांध जाऊं।
रस पीया है, रस पियूँगा,
मैं भौरां हूँ,
मुझे कैद से भय नहीं।
बादलो का काम हैं सींचना,
काटें खिलें या फूल,
उससे उनको प्रेम नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

सौतनें


कहीं दुपट्टा लपेटते – लपेटते,
वो परायी हो गयीं.
कहीं कंचे खेलते – खेलते,
हम जवान हो गए.
वो जब तक लौटीं,
अपने दो बच्चों के संग.
हम भी किसी के,
शौहर हो गए.
कभी काजल की डिबिया,
दिया था जो स्कूल में,
उनकी आँखों का रंग देख कर.
आज उसी को लगाती हैं,
मेरी बेगम की आँखों में,
उनकी दिलो-जान बन कर.
की बांटती है हर,
सुख-दुःख, दर्द की बातें.
बस वो ही एक राज,
अपने सीने में रख कर.
कौन कहता है की,
सौतनें, बहने नहीं होतीं.
बस रात के सफर में,
कभी साथ नहीं होतीं.

परमीत सिंह धुरंधर

जूनून


कुछ तो किस्मतों का साया है,
मोहब्बत में जिंदगी बस, जाया है.
सरहदों पे मिटने वालों की,
कब हुईं हैं ये जागीरें,
इश्क़ में रह जाती हैं,
बिना छत के ही घर की दीवारें.
फिर भी ये जूनून है,
हमारे जिस्म का,
साँसों के रुकने तक,
लगी रहती हैं हमारी उम्मीदें.

परमीत सिंह धुरंधर

मधुर नहीं है प्रेम कोई


मधुर नहीं है प्रेम कोई,
न मधुर ही है कोई ख़्वाब हाँ.
कहीं डूब रहा है सूरज रोज,
कहीं घट रहा है रूप चाँद का.
कहीं पुष्प को इंतज़ार है,
किसी भ्रमर के चुम्बन का.
कहीं भ्रमर भी है कैद में,
हो आसक्त इस पराग का.
जलने को अब क्या रखा है,
महबूब तेरी यादों के सिवा.
तेरे योवन पे टूटे दर्पण कई,
मेरे योवन को न मिला कोई तुझ सा.

परमीत सिंह धुरंधर

Love is not sweet…Crassa