काजल


गम में डूबी मेरी रातों को,
तेरी आँखों का काजल बन जाने दे.
कुछ नहीं मेरे महबूब,
तो अब अपनी आगोस में मुझे पनाह लेने दे.
जब से देखा है तुझे इन आँखों ने,
अब इन्हे किसी मंजिल की चाह नहीं।
मिटने का गम हम राजपूतों को नहीं,
मगर मुझे मिटा दे तू,
मेरे सीने पे ऐसा खंजर उतर जाने दे.
तेरे ओठों की लालसा,
अब जिंदगी से ज्यादा है.
विष ही सही,
पर, अब इन्हे मुझे चख लेने दे.

परमीत सिंह धुरंधर

एक गुलाब


कैसे कहें तुमसे,
वो आँखों की बात।
तुम दूर रहती हो.
पर लगती हो बड़ी ख़ास.
वो सीधे -सीधे तुम्हारा,
किताबों को देखना।
वो सखियों के बीच,
बैठे – बैठे उनको पढ़ना।
मुझे याद है अपनी,
हर वो मुलाक़ात।
तुम दूर- दूर रहती थी.
पर लगती थी बड़ी ख़ास.
वो सोमवार को तुम्हारा,
खुली जुल्फों में आना.
वो मंगलवार को,
मेरी रहे काट जाना।
वो बुधवार को प्रैक्टिकल,
में मेरे मेढक का लहराना।
वो तुम्हारे अधरों पे,
सागर की मुस्कान का उभर आना.
मुझे अब तक याद है,
वो शोख तुम्हारा अंदाज।
तुम दूर- दूर रहती थी.
पर लगती थी बड़ी ख़ास.
प्रिये, इस जीवन में अब तो,
हो नहीं सकता अपना मिलन हाँ.
जाने कैसे बुझेगी अब,
मेरे विरहा की ये आग.
बस एक ही तमन्ना है,
मेरी मौत पे आना तुम जरूर,
बस रखने एक गुलाब।
तुम दूर- दूर तो रहोगी,
पर लगोगी फिर भी बड़ी ख़ास.

परमीत सिंह धुरंधर

मंदिर से मयखाने


मस्ती के मेरे पैमानों का,
भी क्या अंत हुआ.
अधरों तक जाते – जाते,
दिल टूट गया.
एक ही चुम्बन में मुझे,
एहसास हुआ.
मोहब्बत में बस साँसों का,
व्यापार हुआ.
एक ही रात में वो,
सब कुछ पा गयीं।
मेरा घर-संसार,
जल कर राख हुआ.
वो मयखाने से,
मंदिर की मूरत बनी.
मैं मंदिर से मयखाने,
का जाम हुआ.

परमीत सिंह धुरंधर

आदमी


अँधा-धुंध दौड़ता आदमी,
क्या पा लेगा।
ठोकर लगेगी,
और सब बिखर जाएगा।

परमीत सिंह धुरंधर

समंदर


दिल मेरा टूट गया,
समंदर में जाकर।
पर, अब भी तन्हा है समंदर,
मेरी तन्हाई को पाकर।
लहरों का धनी समंदर,
मुझ फकीर पे क्या हंसेगा।
वो समेटता है जिन मोतियों को,
मैं चलता हूँ उन्हें ठोकरों से उड़ा कर।

परमीत सिंह धुरंधर

दर्द


मेरी नज़रों में झांककर,
न देख मेरे दर्द का लिबास।
बस रातें हीं काली हैं यहाँ,
पर जल रहे है दूर तक चिराग।

परमीत सिंह धुरंधर

हौसला


मंजिलों का क्या है,
राहें भटका देतीं हैं.
राहों का क्या है,
मंजिले मिटा देती हैं.
अपने हौसलों से,
चलता है मुसाफिर,
वरना आँधियाँ तो,
हर चिराग बुझा देती है.
दर्द पे अपने लबों को,
सी ले तू.
ख़राब मौसम तो,
पुराना हर रोग बढ़ा देती है.

परमीत सिंह धुरंधर

ऐसी रात हो


ग़मों की ऐसी रात हो,
तुम्हारी जुल्फें,
मेरे सीने पे बिखरीं हों.
मेरी आँखों से बरसते आंसूं,
तुम्हारी गालों पे थिरकती हों.
थका, निराश मन, हार कर,
तुम्हारी आगोस में पनाह ले.
और एक नयी सुबह के जोश में,
उठे, बढे, संग तुम्हारे,
एक नईं मंजिल की और.
अंततः,
तुम्हारे अंगों पे,
मेरे जंगे-जीत की निशानी हों.
ग़मों की ऐसी रात हो,
तुम्हारी जुल्फें,
मेरे सीने पे बिखरीं हों.

परमीत सिंह धुरंधर

किस्मत


मेरी पलकें अभी तक हैं भींगी-भींगी,
उनका चेहरा झुर्रियों से सवरने लगा।
वो भूल गयीं जिन पेड़ों की छावं,
उनकी शाखाओं पे फिर न कोई पुष्प खिला।
राहें – किस्मत को देखा मैंने बदल – बदल कर,
उनकी झोली में पुष्प और मुझे बस काँटा मिला।

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी


शेरो की बस्ती देखी,
बस्ती में शेर देखा।
रिश्तों की कश्ती देखी,
कश्ती में रिश्ता देखा।
दूध के लिए बिलखते बच्चें देखें,
बच्चों के लिए तरसते,
बून्द-बून्द, छलकते दूध देखा।
फटे-चीथड़े आँचल में जवानी देखी,
जवानी में फटा – चिथड़ा आँचल देखा।
२० से २५ तक,
लिव -इन -रिलेशनशिप देखी,
३० के बाद,
शादी को तरसती आँखे देखीं।
प्यार में सबका,
दिल तोड़ती एक लड़की देखी,
और चोट खाने के बाद,
उसको माय चॉइस गाते देखा।

परमीत सिंह धुरंधर