छोटा शहर है, न छोड़ा कीजिये


रिश्तों को ऐसे न तोडा कीजिये,
छोटा शहर है, न छोड़ा कीजिये।
बड़े शहर में बिखर जाओगे,
भीड़ है इतनी की पिछड़ जाओगे।
फिर याद आएगी मेरी चुनरियाँ।
रिश्तों को ऐसे न तोडा कीजिये,
छोटा शहर है, न छोड़ा कीजिये।
अभी पैसों की चाहत है, समझ नहीं पाओगे,
काँटों में फंस के, उलझ जाओगे।
फिर याद आएगी मेरी नगरिया।
रिश्तों को ऐसे न तोडा कीजिये,
छोटा शहर है, न छोड़ा कीजिये।
यहाँ माँ है, ममता है, हैं बगीचे हरे- भरे,
जब ठोकरों में होगी तुम्हारी जिंदगी,
याद आएगी तब मेरी नजरिया।
रिश्तों को ऐसे न तोडा कीजिये,
छोटा शहर है, न छोड़ा कीजिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक फतह तो लिख


हार कर,
कहाँ छुप जाऊं,
ये तो बता दे खुदा।
रुसवाई है, तन्हाई है,
उसपर हैं,
ये शिकस्त की बेड़ियाँ।
मुझे उनके सर पे,
ताज का गम नहीं।
पर इस जंग में,
एक फतह तो लिख,
मेरे नाम पे खुदा।
बेवफाई है, महंगाई है,
उसपर हर तरफ,
खनकती हैं चूड़ियां।
मुझे उनकी डोली उठने,
का गम नहीं।
पर इस प्रेम में,
एक रात तो लिख,
मेरे नाम में खुदा।
आवारा हूँ, बंजारा हूँ,
उसपर मंजिलों से मिटती नहीं दूरियाँ।
मुझे अपनी, मात – पे – मात,
का गम नहीं।
पर इस खेल में,
कभी तो मेरी भी शह,
लिख दे खुदा।
परमीत सिंह धुरंधर

छपरा से कटिहार तक


माँ ने कहा था बचपन में,
तुम लाल मेरे हो लाखों में.
तुम्हे पा कर मैं हर्षित हुई थी,
नाचे थे पिता तुम्हारे, जब आँगन में.
गोलिया चली थीं, तलवारे उठीं थी,
छपरा से कटिहार तक.
बाँट रहे थे सप्ताह – भर, रसोगुल्ला,
बड़े -पिता तुम्हारे, कोलकत्ता में।
दादी ने चुम्मा था माथा तुम्हारा,
गिड़ – गिड़ के पीपल पे.
दादा ने फुला के सीना,
खोल दिया था खलिहान, जन – जन में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अनुभव


११ साल हो गए बिछड़े। हर गुजरते साल के साथ, आँसूं तो काम होते जा रहे हैं, दर्द और यादों का बोझ बढ़ता जा रहा है. मगर पता नहीं पितृपक्ष में ना यादें आती हैं, ना दर्द होता है, न ही बोझ का एहसास। हवाओं में कोई है जो मुझे सहारा दे रहा है या मेरी साँसे बनके दिल के दर्द पे मलहम लगा रहा है, बिना बताये। तिलों में कुछ है, जो विज्ञान नहीं समझ सकता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


इश्क़ करना जरुरी है जिन्दा रहने के लिए,
जिन्दा रहना जरूरी है हुस्ने -बेवफाई समझने के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी


जवानी थी,
तो किसी बेवफा,
के पीछे बरबाद कर दी.
अब तन्हाई और बुढापे में,
बाप और उनकी सीखें,
याद आती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जंग


जंग कभी सितारों में नहीं होती,
जब की चाँद केवल एक है.
क्यों की उनको पता है,
चाँद सिर्फ बेवफा होता है.
जंग पतंगों में भी नहीं होती,
जब की शमा भी केवल एक है.
क्यों की उनको भी पता है,
इश्क़ में मरना सिर्फ पतंगों को है.
जंग तो भौरों में भी नहीं होती,
कलियों के रास को लेकर।
क्यों की भौरें जानते हैं,
साँझ होते ही कालिया,
वफ़ा – महब्बत सब भूल जाती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

उम्मीदों का पत्र


पद और पुरस्कार,
कुछ नहीं,
मेरे दिव्य ललाट के समक्ष।
चाहत तो बिलकुल नहीं,
इस जग में अपने लिए,
इस कलम के समक्ष।
जिस समूह में हर इंसान,
विभूषित है साहित्यकार बन कर.
मैं अपनी उम्मीदों का पत्र,
कैसे रखूं उन विकृत विद्वानों के समक्ष।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हम फिर से कुरुक्षेत्र का निर्माण करेंगे


हार जिंदगी का अंत नहीं।
हार अगली जीत का शुभारम्भ हैं.
वो जीत कर कोइसिस करेंगे खुद को बचाने की,
हम हार कर कोसिस करेंगे,
खुद को उठाने की,
लोगो को जगाने की.
वो जीत कर दम्भ करेंगे,
हम हार कर उठान करेंगे।
लोहिया को तोड़ न सके,
वो बार – बार हरा कर.
बोस को मिटा न सके,
वो जूठी अफवाहे उठा कर.
वो जीत कर सत्ता को प्राप्त करेंगे,
हम हार कर पुनः संघर्ष और प्रयास करेंगे।
जीत उनकी भी अमर नहीं,
और हार मेरी भी अटल नहीं।
हम फिर से इस कुरुक्षेत्र का निर्माण करेंगे।
मेरे अंत तक इस सत्ता परिवर्तन,
को आवाहन करेंगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो कैसे संभाले?


दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
मुरादों को जला दिया है,
उम्मीदों को कब का दफना दिया है.
फिर भी आँखे जो देखें खवाब,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
रास्तों, गलियों, शहर तक छोड़ के उनका,
इन घने वीरानों में बैठें हैं.
फिर भी हवाएं उड़ा लाएं दुप्पट्टा,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
होंठों की प्यास को नसीब मान लिया है,
उनकी बेवाफ़ाई को अपना जहाँ मान लिया है.
फिर भी कोई आँचल ढलका दे,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?

 

परमीत सिंह धुरंधर