शिव ने जब भी किया है विषपान,
जग में तब – तब हुआ है मंगल गान.
नारायण को मिलीं लक्ष्मी,
देवों ने किया अमृत – पान.
जब गरल से बढ़ा जग में संताप,
केवल शिव ने रखा हलाहल का मान.
परमीत सिंह धुरंधर
शिव ने जब भी किया है विषपान,
जग में तब – तब हुआ है मंगल गान.
नारायण को मिलीं लक्ष्मी,
देवों ने किया अमृत – पान.
जब गरल से बढ़ा जग में संताप,
केवल शिव ने रखा हलाहल का मान.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम शिव हो, तुम शंकर हो,
इस जगत के तुम सवामी निरंतर हो।
मैं अज्ञानी पापी प्रभु,
ज्ञान के तुम सागर-समुन्दर हो.
तुम कालजयी, कालनायक,
विश्व के तुम संहारक हो.
मैं तुच्छं-सुक्ष्म,विरह-वाशना से बंधा,
निर्गुण के तुम धुरंधर हो.