बिस्तर की चाहत क्या होती है?
ये उन जाड़े की रातों से पूछो।
जिनके ख्वाब टूट जाते हैं,
सुबह की किरणों से.
चादर की सिलवट क्या होती है?
पूछों उन रातों से, जो ढल जाती हैं,
अपने अधूरेपन को छुपाने में.
परमीत सिंह धुरंधर
Every thing is related to love and beauty
बिस्तर की चाहत क्या होती है?
ये उन जाड़े की रातों से पूछो।
जिनके ख्वाब टूट जाते हैं,
सुबह की किरणों से.
चादर की सिलवट क्या होती है?
पूछों उन रातों से, जो ढल जाती हैं,
अपने अधूरेपन को छुपाने में.
परमीत सिंह धुरंधर
हम उन मयखानों के नहीं,
जिनके प्याले टूटते नहीं।
हम उन सितारों के भी नहीं,
जो अपनी चाल बदलते नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।
उस चाँद की आशिकी ही क्या?
जिसमे कोई दाग नहीं।
उस दरिया की मस्ती ही क्या?
जो अपने किनारों को डुबाता ही नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
वो भूल गयी हमको,
अपने इश्क़ के जद्दोजहद में.
उन्हें अब कुछ याद नहीं,
अपना घर बसाने के कसमोकस में.
मगर आज भी नहीं बदला हैं,
उनका वो एक अंदाज।
वो बाजार में मुस्काराती हैं, आज भी,
अपने आँखों में शर्म को उतार के.
परमीत सिंह धुरंधर
मैंने इश्क़ किया उस दरिया से,
जिसकी धारा के कई किनारे हैं.
मैं क्या बाँधूँ उसकी लहरों को,
जो बस खारे – सागर के ही प्यासे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
सत्य की पूजा नहीं होती,
धर्म की चर्चा नहीं होती।
वेदों को जरूरत नहीं,
जिन्दा रहने के लिए,
की मनुष्य उसे पढ़ें।
वेदों की उत्पत्ति,
मनुष्यों से नहीं होती।
तैमूर, चंगेज, क्या?
सिकंदर भी थक गया था,
यहाँ आके.
ये हिन्द है,
यहाँ तलवारो के बल पे,
तकदीरें सुशोभित नहीं होती।
वो जितना भी सज ले,
तन पे आभूषण लाद के.
मगर, यहाँ, बिना शिशु को,
स्तनपान कराये,
नारी कभी पूजित नहीं होती।
घमंड किसे नहीं,
यहाँ सृष्टि में.
बिना अहंकार के,
सृष्टि भी शाषित नहीं होती।
तीक्ष्ण बहुत है तीर मेरे,
मगर बिना तीक्ष्ण तीरों के,
शत्रु कभी पराजित नहीं होती।
मुझे संतोष है,
की वो वेवफा निकली।
क्यों की बिना बेवाफ़ाई के,
कोई स्त्री कभी परिभाषित नहीं होती।
परमीत सिंह धुरंधर
तनी घूँघट में छुप के गोरी,
दालान में आजा.
भरल दुपहरिया में ठंडा,
दही-चूरा खिला जा.
अबकी के कटनी में,
नया कमरघानी बनवा देम.
तनी अंचरा गिरा के गोरी,
कमर नपवा जा.
छोड़ अ अब कहल,
बाबुल के प्रेम के कथा।
तनी फुरसत में,
तोता -मैना के किस्सा वाच जा.
अब की के दवनी में,
नायका लहंगा दिलवा देम.
तनी अंचरा गिरा के गोरी,
कमर नपवा जा.
कब तक माई-भाई के चिंता में,
जोबन के बांध बू.
कभी फुरसत में,
हमसे तेल लगवा जा.
अबकी के फगुवा में,
नायका चोली सिलवा देम.
तनी अंगिया हटा के,
जोबन नपवा जा.
तनी घूँघट में छुप के गोरी,
दालान में आजा.
भरल दुपहरिया में ठंडा,
दही-चूरा खिला जा.
अबकी के कटनी में,
नया कमरघानी बनवा देम.
तनी अंचरा गिरा के गोरी,
कमर नपवा जा.
परमीत सिंह धुरंधर
आँखें तुम्हारी बड़ी बड़ी,
ये जुल्फे बिखरी सी l
क्या बात है हुस्न का तुम्हारे सनम,
हर दिल में तुम्ही उतरी सी l
है नशा जो तेरी आँखों में,
हम मयखाने में क्यों जाये l
है वफ़ा जो तेरी साँसों में,
हम पैमाना क्यों छलकाए l
तुमको पिलाना है पिला दो
मदहोश बनाना है बना दो l
तुम्हारे खूबसूरत जिस्म पे,
लहराता हुआ आँचल,
पागल करता है हमें,
तुम्हारी जुल्फों का बादल l
तुम्ही हो जब सावन की बदली,
हम कहीं और क्यों भींग जाए l
है वफ़ा जो तेरी साँसों में,
हम पैमाना क्यों छलकाए l
दिल में आग सी आप बसे हो,
कल नहीं आज नहीं बरसो से छुपे हो l
जब नाम आपका है गुनगुनाने को,
हम कोई और नगमा क्यों गाए l
परमीत सिंह धुरंधर
तुम जरा जो धीरे से चल दो,
मेरी सांसें मेरा साथ दे दे l
बस इतना कहना जो तुम मानो,
मेरे दिल में भी मौजे उमंग हो l
ना चाहत है मोहब्बत की तुमसे,
ना आरजू पास आने की l
मौत के दर पे खड़ा हूँ,
और क्या सजा है दिवाली की l
तुम जुल्फों का कफ़न जो पहना दो,
मेरी मौत भी दुल्हन बन सज संवर ले l
तुम जरा जो धीरे से चल दो,
मेरी सांसें मेरा साथ दे दे l
ये शर्मो हया ये कमसिन अदा,
तेरा हुस्न ऐ जालिम सारे जहाँ में है जुदा l
तुम जरा जो काजल लगा लो आँखों में,
मेरा दर्द भी कहीं छुप ले l
जाते जाते हमें इस जहाँ से
वो मंजर तो दिखला दो l
घुघंट उठ रहा हो तुम्हारा,
शर्म से पलके जड़ गई हो l
तुम जरा जो ऐसे संवार लो,
मेरी धड़कने भी मोहब्बत कर ले l
तुम जरा जो धीरे से चल दो,
मेरी सांसें मेरा साथ दे दे l
बुरा न मानो इस दिल का,
ये तो प्रेम का मारा हुआ है l
देख के हुस्न को तुम्हारे,
चित इसका भी बदला हुआ है l
तुम जरा मित्रता कर लो,
ये परमीत भी मनमीत बन ले l
तुम जरा जो धीरे से चल दो,
मेरी सांसें मेरा साथ दे दे l
These lines were written in 2004 during my interview for the post of Scientist C at BARC, Mumbai.
परमीत सिंह धुरंधर
ऐसे नहीं होता शिकार,
इश्क़ में, जिस्म का.
फिर अंतर ही क्या रह जाएगा?
हुस्न से, इश्क़ का.
परमीत सिंह धुरंधर
मिल जाती है सबको ही सोहरत,
बाजार में.
ये सोहबत है, जो मिलती है,
बस पाठशालाओं और मयखानों की,
बंद दीवार में.
उनका आँचल है जो,
चुपके से सरक जाता है,
हर एक रात.
वक्षों को छोड़कर,
अकेला, निहत्था,
मझधार में.
ये तो सोहबत है, लबों की,
जो अपनी प्यास मिटाने को,
कर देता है आगे,
निरीह, सुसुप्त, वक्षों को,
भीषण संग्राम में.
परमीत सिंह धुरंधर