ये जवानी तेरे वक्षों पे गुजरे


जिंदगी का हर बंधन, तन्हाई में गुजरे,
मगर ये जावानी तेरे संग एक चटाई पे गुजरे।
तू सरक न सके, मैं सरकने ना दूँ,
तू पलट न सके, मैं पलटने ना दूँ.
इसी जद्दोजहद में, पूरी रात यूँ ही लड़ाई में गुजरे।
मगर ये जावानी तेरे संग एक चटाई पे गुजरे।
तू सोचे की तेरे माँ – बाप ने कहाँ बाँध दिया,
मैं सोचूं की कमबख्त ये कहाँ फंस गया.
इसी पेशोपश में उम्र का हर लम्हा गुजरे।
मगर ये जवानी तेरे वक्षों पे गुजरे।
जिंदगी का हर बंधन, तन्हाई में गुजरे,
मगर ये जावानी तेरे संग एक चटाई पे गुजरे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कोयल से बोला काग रे


मधुर – मिलान की आस में,
कोयल से बोला काग रे.
कभी तो आके बैठ ज़रा,
मेरी इस डाल पे.
तू भी तो देख जरा आके,
कितना यहाँ सूनापन,
और कितनी मुझमे तेरी प्यास रे.
मधुर – मिलान की आस में,
कोयल से बोला काग रे.
तू भी काली, मैं भी काला,
फिर भी दुनिया तुझको पूजती।
छल लेती है हर बार तू मुझे,
फिर भी जग को सच्ची तू ही दिखती।
कभी तो समझ इस दिल को तू,
ये कितना अकेला और बेताब रे.
मधुर – मिलान की आस में,
कोयल से बोला काग रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बहती रहूँ यूँ ही


दरिया – दरिया इश्क़ करूँ मैं,
सागर-सागर प्रीत रे.
तू जो रहे हर किनारे पे मेरे,
बहती रहूँ यूँ ही, मैं, सदा – नित रे.
मेरी लहरें, मेरी हो कर भी,
रहती हैं सदा तेरी चाह में.
जल सी ठंठी हो कर भी मैं,
सुलगती रहती हूँ तेरी आस में.
तू जो मेरी लहरों पे ही हर कंकड़ मारे,
बहती रहूँ यूँ ही, मैं, सदा – नित रे.
दरिया – दरिया इश्क़ करूँ मैं,
सागर-सागर प्रीत रे.
तू जो रहे हर किनारे पे मेरे,
बहती रहूँ यूँ ही, मैं, सदा – नित रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खता तुम्हारी माफ़ कर दूंगी


तुम रात भर बैठों मेरे पास आकर,
मैं दिनभर सपने देख के गुजारा कर लुंगी।
तुम बस मेरे साँसों को छू दिया करो इन ओठों से,
मैं हर खता तुम्हारी माफ़ कर दूंगी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ करो उससे


इश्क़ करो उससे,
जो तुमपे तंज कस दे.
वरना हुस्न तो सदा से बिछता रहा है,
क्रूर शासकों के नीचे।
वो घर बसा दें, या तुम्हे औलादें दे दें,
इसे उनकी मोहब्बत मत समझों।
कुछ तो उनकी भी जरूरतें हैं,
वरना वो यूँ तुम्हारे आगे खामोस नहीं रहते।

 

परमीत सिंह धुरंधर

औरत – मर्द


वो जो कल तक,
मेरी किस्मत बदलना चाहती थी,
अब अपना घर बदल रही हैं.
मर्द बस बदनाम हैं इस बाजार में,
गली – गली में औरत अपना बिस्तर,
बदल रही है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत में अपने ये रोजे


किस्से तो कई हैं,
बंद दीवारों के अंदर।
हौसलें नहीं है,
की कोई उनको खुले आसमान के तले पढ़े.
मेरी मोहब्बत कुछ इस कदर हैं उनसे,
की पलके बिछा दी,
उन्होंने जहाँ – जहाँ अपने कदम रखे.
जा चुन ले किसी को भी जमाने में,
मुझे छोड़कर।
हम फिर भी रखेंगे,
तेरी मोहब्बत में अपने ये रोजे।

 

 

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो मेरे अंगों से खेले


वो मेरे अंगों से खेले,
तो हम समझें की आईने में कमी क्या है.
जमाना कहता है की,
करवा – चौथ मेरे पाँवों की बेड़ियाँ हैं.
वो क्या समझेंगे,
इन बेड़ियों को पहन के मैंने पाया क्या है.
आवो,
कभी सुन ले – सुना ले एक दूसरे को,
की तुमने औरत को हर विस्तर पे सुला के,
उसके संग सो के,
किन उचाईयों पे पहुंचा दिया.
और मैं एक व्रत कर करवा – चौथ का,
कौन सा एहसास जी लिया है.

 

 

 

परमीत सिंह धुरंधर

Spark


The color is dark,
But she has the spark,
That I need.
Who cares about the skin?
If she could touch my heart.

 

Parmit Singh Dhurandhar

निहारती ही रही आईने को उम्र भर


तुम कभी समझ ही नहीं सके हमारे रिश्ते को दिल से,
तुम चाहे जितना भी पढ़ लो किताबें अपने जीवन में.
मुझे ये गम नहीं की हम एक साथ न रह सके,
तुमने कभी चाहा ही नहीं की हम साथ रहें खुशियां बाँट के.
तुम निहारती ही रही आईने को उम्र भर,
कभी खवाब संजोया ही नहीं आँखों को मूंद के.
लाखों हैं यहाँ तुम्हारे जोबन के गिरफ्त में,
मगर तुम अब भी नहीं हो किसी एक के भी वफाये – जहन में.

 

परमीत सिंह धुरंधर