बक्षों पे उठाया नहीं जाता


हुजूर, आपसे अब यहाँ उम्र का गुजर नहीं होता,
कुछ मिले हमें भी अब की यूँ तन्हा इसारा नहीं होता।
ढलें हैं चेहरे ही बस, मंसूबें अब भी जवानी की मौजों में हैं,
यूँ घूँघट में अब सब कुछ मुझसे बांधा नहीं जाता।
कब तक आईना दिखलाये मुझे भंवर मेरी योवन का,
अब आँचल का भार यूँ बक्षों पे उठाया नहीं जाता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

भोले – भाले खत्री


मेरे सैयाँ छैल – छबीले,
दिखाते हैं खूब रोआब।
जब चाहे पकड़ लेते हैं,
मेरी पतली कमर,
चाहे धुप हो या हो छावँ।
मेरे सैयाँ बड़े सजीले,
रखते हैं खूब ध्यान।
थक जाऊं थोड़ा भी,
तो दबा देते है पैर – हाथ.
मेरे सैयाँ खूब नखरीले,
तुनक जाते हैं हर एक बात.
मैं पकाऊं मछली,
तो मांगते हैं वो मांस।
मेरे सैयाँ भोले – भाले,
खत्री उनका नाम.
खोल नहीं पाते,
एक बटन चोली का,
मेरी कैसी फूटी किस्मत राम.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मीरा के मोहन


तुम्हारी नजर के हैं दीवाने सभी,
मेरी हर नजर में तुम्हीं हो तुम्हीं।
रुस्वा करो, तनहा रखो,
शिकवा कोई, कभी ना, कहीं।
अब इस जिंदगी में बस तुम्हीं हो तुम्हीं।
धूल में रहूँ, काँटों में रहूँ,
मुस्कराती रहूंगी, बस अपने चरण में रखो.
इस मीरा के अब मोहन तुम्हीं, तुम्हीं हो तुम्हीं।
एक विष सा है, ये सम्पूर्ण जीवन मेरा,
बनके प्रभु, अब इसकी लाज रखो.
हर अग्नि-परीक्षा, हंस कर दे दूंगी,
आजीवन, बस, तुम मेरे, केवल मेरे ही रहो.
की इस अबला सीता के,
अब राम बस, तुम्हीं हो तुम्हीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


मत पूछो इश्क़ में क्या गुजरती है मुझपे रातों को,
समंदर आज तक फीका हैं, जो चख लिया एक बार उन ओठों को.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


इश्क़ करना जरुरी है जिन्दा रहने के लिए,
जिन्दा रहना जरूरी है हुस्ने -बेवफाई समझने के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खत्री भी घायल है


लूट लेंगे रानी, तेरी जावानी के भार को,
कब तक संभालोगी, इस कच्ची कमान को.
हम भी हैं गावँ के, मिटटी में खेले हैं,
चित कर देंगे तुम्हे, बस लग जाने दो एक दाव तो.
लूट लेंगे रानी, तेरी जावानी के भार को,
कब तक संभालोगी, इस कच्ची कमान को.
सबकी नजर है, सबको खबर हैं,
खत्री भी घायल है, देख तेरे अंग – अंग को.
लूट लेंगे रानी, तेरी जावानी के भार को,
कब तक संभालोगी, इस कच्ची कमान को.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ, मुझको पति चाहिए


माँ, मुझको पति रूप में,
बस वो एक खत्री चाहिए।
माँ, पिता को भी अब ये,
बात पता चलनी चाहिए।
मत पूछ की उसमे ऐसा है क्या?
रोबीला, छबीला, गठीला है वो हाँ.
शातिर है, चालक है, चालबाज है वो,
मुझे ऐसा ही मर्द खतरनाक चाहिए।
माँ, पिता को भी अब ये,
बात पता चलनी चाहिए।
आँखों से जो मदहोस कर दे,
बाहों में लेके जो खामोश कर दे.
तारे, चाँद, ना ये सितारे चाहिए,
बस खत्री के आँगन में एक खाट चाहिए।
माँ, पिता को भी अब ये,
बात पता चलनी चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जंग


जंग कभी सितारों में नहीं होती,
जब की चाँद केवल एक है.
क्यों की उनको पता है,
चाँद सिर्फ बेवफा होता है.
जंग पतंगों में भी नहीं होती,
जब की शमा भी केवल एक है.
क्यों की उनको भी पता है,
इश्क़ में मरना सिर्फ पतंगों को है.
जंग तो भौरों में भी नहीं होती,
कलियों के रास को लेकर।
क्यों की भौरें जानते हैं,
साँझ होते ही कालिया,
वफ़ा – महब्बत सब भूल जाती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हिंदी दिवस और खत्री को प्रेम निवेदन


हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पे दोस्तों ने पकड़ लिया. सब हंस कर कहने लगे तो भाई कुछ करोगे की नहीं हिंदी के सम्मान में.
मैंने कहा, “हम क्या कर सकते हैं? ज्यादा से ज्यादा किसी को अपना प्रेम निवेदन कर सकते हैं हिंदी में.”
हमने कॉलेज की सबसे सुन्दर लड़की अरुणा खत्री को कॉलेज के गेट पर ही सुबह – सुबह घेर लिया। अरुणा खत्री सुन्दर, तेज, हाजिर जबाब के साथ – साथ शातिर और चालक थी. बाज की नजर और खत्री की नजर से कबूतर से लेकर कॉलेज के लड़के तक डरते थे. ऐसे में वहाँ तुरंत भीड़ लग गयी की भाई किसकी इतनी हिम्मत की खत्री को पकड़ लिया, वो भी वैलेंटाइन डे पे नहीं पकड़ के हिंदी दिवस पे.  बहुत बिनती करने, पैर पकड़ने पे भी खत्री का दिल नहीं पसीजा। अंत में पता नहीं खत्री को क्या हुआ. वो थोड़ी आवाज मीठी करके, आदाओं पे इठलाती हुई बोली, “क्यों तुम्हे स्वीकार करूँ मैं?” मैंने कहा, “मैं तुम्हे दिमाग से बहुत पसंद करता हूँ. मैं तुम्हे अपना दिमाग देना चाहता हूँ.” जीवन में पहली बार किसी ने आज दो साल में, कालेज में खत्री के दिमाग पे जोर डाल दिया था. उसने बोला, “क्या मतलब? लोग दिल देते हैं प्यार में और तुम दिमाग दोगे। कैसे?” मैंने कहा, “अपनी शादी हो गयी तो आपके बच्चों में दिमाग 5०% मेरा होगा।” उसने गुस्साते हुए कहा, “सिर्फ मेरे बच्चे, तुम्हारे नहीं।” मैंने कहा, “अरुणा, शादी के बाद तुम अदालत से बच्चों का हक़ नहीं मांगोगी, क्या तलाक के बाद? अगर तब उन्हें तुम अपना कहोगी तो आज क्यों नहीं?” खत्री ने आँखे तैराते हुए कहा की अब तो वो बिलकुल नहीं शादी करेगी उससे जो तलाक की बात करता है. मैं, ” अरे यार खत्री, ये गजब हैं लिविंग रिलेशन जब चाहे छोड़ दो पर तलाक को क्यों गलत मानते हो फिर. पर खत्री टस से मस ना हुई. अंत में हार कर मैंने कहा, “यार तो २5% दिमाग ले लो.” वो बोली, ” वो कैसे?”  मैंने कहा की अपने बच्चों की शादी करेंगे। पता नहीं उसको क्या जच गया, वो मान गयी. दोस्तों ने पूछा तो मैंने कह दिया उसने स्वीकार कर लिया मेरा प्रेम निवेदन की हम लोग शादी करेंगे। दोस्त बोले, “शादी!” मैंने कहा, “हाँ, वो तैयार है, हामरे बच्चों की शादी के लिए”. और सारे कॉलेज में ये बात फ़ैल गयी. इस तरह वो हिंदी दिवस, हंसी दिवस में बदल गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो कैसे संभाले?


दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
मुरादों को जला दिया है,
उम्मीदों को कब का दफना दिया है.
फिर भी आँखे जो देखें खवाब,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
रास्तों, गलियों, शहर तक छोड़ के उनका,
इन घने वीरानों में बैठें हैं.
फिर भी हवाएं उड़ा लाएं दुप्पट्टा,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
होंठों की प्यास को नसीब मान लिया है,
उनकी बेवाफ़ाई को अपना जहाँ मान लिया है.
फिर भी कोई आँचल ढलका दे,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?

 

परमीत सिंह धुरंधर