प्रबल, सुयोजित आकर्मण


दिल के सरहदो पे मेरे,
उनके चक्षुओं का जाल फ़ैल रहा है.
गिर रहें हैं मेरे सीमा – प्रहरी एक – एक कर,
उनके हुस्न ने ऐसा,
प्रबल, सुयोजित आकर्मण कर दिया है.
भयभीत हो उठीं है सारी धड़कने मेरी,
अपने भविष्य की चिंता से ग्रसित हो कर.
विखंडन के कगार पे है,
मेरा ३६ सालों का ये एक छत्र साम्राज्य।
अब जिसकी जमीं पे,
उनकी उपनिवेशिक गतिविधिया उत्थान पे हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं शर्म से लहुँ-लुहान हो गया


वो कॉलेज का पहला दिन,
क्या खास बन गया!
वो पहली बार मिली,
और दिल खामोश रह गया.
दो चोटी जुल्फों की,
सीने पे झूल रहीं।
वो पास आके बैठीं,
और मैं शर्म से,
लहुँ-लुहान हो गया.
वो ज्यों-ज्यों संभालती रहीं,
अपना दुप्पट्टा।
मैं कभी पेन्सिल उठता रहा,
कभी पेन गिराता रहा.
उनकी घूरती आँखों में,
एक सवाल बनके रह गया.
फिर नहीं हुआ कभी ये हादसा,
उनकी आँखों में कोई और था बसा.
वो चलती रहीं परिसर में,
थाम के किसी की बाहें।
और वो यादे लिए मैं,
अकेला ही रह गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अब तेरे पाँवों में बेड़िया नहीं, खनकती चूड़ियाँ हैं


सितारों से भी जयादा तन्हाई लिए हूँ,
एक उदासी सी बैठ गयी है जिंदगी में,
तेरे जाने के बाद.
मैं आज तक वो दर्द, वो बेबसी,
वो गहराई लिए हूँ.
जवानी तो उसी दिन ढल गयी,
कहानी भी जिंदगी की खत्म हो गयी,
जब तूने राहें बदल लीं.
मैं तो आज तक वो निशाँ तेरे क़दमों के,
संजोएं बैठा हूँ.
साँसे तो है, बस सिसकती हुई,
तेरे लौट आने की आस लगाये।
इन्हे कौन बताये?
की अब तेरे पाँवों में बेड़िया नहीं,
खनकती चूड़ियाँ हैं.
मैं आज भी ये राज इनसे,
छुपाये बैठा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हसरते उनकी भी कम जवाँ न थीं


मोहब्बत में उनके अर्ज किया था,
की जान तक अपनी लूटा देंगे।
हसरते उनकी भी कम जवाँ न थीं,
बर्बाद ही करके छोड़ेंगे।
मोहब्बत कुछ ऐसे बढ़ी अपनी,
की जमाना तक दुश्मन हो गया.
पता भी हमें तब चला, जब उनकी,
डोली उठा कोई और ले गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत में थोड़ी- बहुत ममता का होना बहुत जरुरी है


हर मोहब्बत में थोड़ी- बहुत ममता का होना बहुत जरुरी है, वरना वो मोहब्बत, मोहब्बत न होकर, वासना, काम, लोभ और प्रतिशोध बन जाता है. इसलिए तो माँ सर्वश्रेष्ठ है देवों से भी, क्योंकि माँ गलती या पाप होने पे भी उसकी सजा नहीं देती। माँ तो गले लगाती है फिर भी. लेकिन, देवता देते हैं, भाई! ऐसा कोई रिश्ता नहीं है, चाहे पिता, भाई, बहन, दादा, दादी या गुरु का ही रिश्ता हो, जो बिना ममता के बहुत दिनों तक जीवित रह सके!

 

परमीत सिंह धुरंधर

अभी रहे दी घोंसला में


ऐसे मत चलाईं राजा जी,
गुलेल तान – तान के.
की छोट बिया चिड़ाइया,
अभी रहे दी घोंसला में.
कब तक रही चिड़ाइया,
रानी ई घोंसला में.
आज उड़े द, ले लेव इहो
मजा खुलल आसमा के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हम एक धागे में बंध के


मुझे हर रिश्ता पसंद है तेरी आँखों से होकर,
आ जुल्म-सितम सब सह लें, हम एक धागे में बंध के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

यूँ ही धरा पे ये भीषण ठंड रहे


यूँ ही धरा पे ये भीषण ठंड रहे,
और तू यूँ ही मेरी बाहों में सिमटती रहे.
तेरी साँसे जीवित रखें मेरी नसों को,
यूँ ही मेरे रुधिर को गर्मी देती रहें।
मेरी पलकों पे तेरी ओठो का भार रहे,
बस एक रात ही सही सोनिये,
तेरी अधरें मेरी अधरों का आधार बनें।
ऐसे फिर रसपान करता रहूँ रात भर,
की जीवन भर गुमान रहे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

14 फेब्रुअरी (प्रेम-दिवस) और सौगात


घर छोटा था, छत छोटी थी. परिवार बड़ा था. पहला पाठ जो सास ने पैर रखते पढ़ाया था की किसी का दिल मत दुखाना चाहे कष्ट जितना भी हो. अब काम करते-करते, नहाते -कपडे धोते, सूरज सर पे आ जाता था और अब अपनी ढलान पे था. अपने कपड़े सुखाने के लिए उससे कोई जगह नहीं सूझ रही थी इसलिए उसने देवर के के कपड़े उत्तर कर अपने डाल दिए. उन कपड़ो को उसने प्यार से सहेजा, संवारा और रात को सब काम निपटा के, उनको खिला के, उसके कमरे में देने गयी. वह टेबल पे कुछ पढ़ रहा था. उसने कपड़े उसकी टेबल पर रख दिए. उसके पूछंने पे की आपने क्यों उतरा, उसने कहा, “अरे इतना भी हक़ नहीं मेरा।” धीरे-धीरे वो कपडे देने के बाद थोड़ा वह सुस्त लेती थी, दिल हल्का कर लेती थी. दिन भर चलने के बाद वह उसे एक पेड़ मिलता था जिसकी छाँव में वो सुस्त लेती थी. अब तो वो उस पेड़ से अपनी बाते भी कहती और कभी सो लेती थी. इधर उसको यूँ कमरे में ना पा कर उनको अजीब लगता, बेचैनी बढ़ती, शक बढ़ता जो धीरे -धीरे उनके मन के आँगन में पनप रहा था. उसकी हंसी उस कमरे से निकल कर अब उनके आँगन में पनपे पौधे को सींच रही थी. अब तो उसके चेहरे पे एक अलग ख़ुशी देख के उनका पेड़ एक चक्रवात सा महसूस करता। अब उसका यूँ रातो को सजना, तेल लगाना उनको अखरता। पेड़ धीरे -धीरे सींचते, बढ़ाते अब बलसाली बन चूका था, गगन को छू रहा था.

आज भी १४ फेब्रुअरी को वो सज के इंतज़ार कर रही थी. आज उसने पहले ही कपड़े जा के दे दिए थे. उसने ही कुछ दिन पहले बताया था की आज का दिन ख़ास है प्यार के लिए. इसमें अपने ख़ास को कुछ ख़ास सौगात देते हैं. उसने ही समझाया था की कैसे आसान है उसके लिए ये ख़ास दिन मनाना की सुको कोई रोकेगा नहीं। लेकिन बहार उस जैसे लोगो के मिलने पे, समाज-सुधारक, चिल्लाने लगते हैं, लाठी चलाते है, शादी करवा देते है. सीधी सी औरत, जिसकी दुनिया छोटी थी, उसने कुछ नहीं कहा और सपने सजाने लगी की वो भी अपना प्रेम -दिवस मनाएगी। आईने में अपने केसुओं को देखते इंतज़ार कर रही थी, उनके आने का, अपने सौगात मांगने का और उनको सौगात देने का. वो आये, दरवाजा खोला, बिस्तर पे बैठे, वो मुड़ी, इठलायीं, जूठ्मूठ का मुह बनाया। उन्होंने एक कागज़ का बण्डल निकला, उसको हाथ में दिया। उसने इधर-से-उधर उसको पलटा और टेबल पे रखते पूछा, ” ये क्या है? और कहाँ थे अब तक, मैं इंतज़ार कर रही थी?” उसने कहा तुम्हारे लिए है और मुझे हस्ताक्षर कर के दे दो.
उसने कहा,” क्या है लेकिन ये?” उसने एक जबाब दिया,”तलाक के कागज़।”

 

परमीत सिंह धुरंधर

जब से तुम जवान हुई


जब से तुम जवान हुई,
सारा शहर परेशान हुआ.
मयखाने तक सुख गए,
जो तेरा दीदार हुआ.
बादलों ने मंडराना छोड़ा,
भौरों ने कलियों संग,
गुनगुनाना छोड़ा।
आँखों में उतर आएं हैं,
आसमान के सारे तारे।
जब से दुपट्टा तेरा,
कुछ ज्यादा ही ढलकने लगा.

 

परमीत सिंह धुरंधर