You have to be my heart


You have to be my heart,
Then the melting will start.
I will be a sky,
And you will be my star.

Together, we can evaporate,
To make a cloud and a rainbow,
And we will defeat the bask.

 

Parmit Singh Dhurandhar

उनके मुख – मंडल पे सयुंक्ता का सौम्य था


वो नजरों के इसारें,
किताबों के बहाने,
वो सखियों संग चहकना।
वो देर तक प्र्रांगण में रुके रहना,
टूटे चपल के बहाने।
उस प्रेम – प्रसंग का भी एक अपना दौर था,
जिसका नायक था मैं, चौहान सा,
और उनके मुख पे, सयुंक्ता का मान था.

वो कई – कई हफ्ते गुजर जाना,
बिना मिले।
और मिलने पे,
बिना संवाद के,पल का गुजर जाना।
वो उनका बिना पसीने के,
मुख को दुप्पटे से पोछना।
और आते – जाते लोगो के मुख को,
आँखों से तकना।
उस प्रेम – प्रसंग का भी एक अपना दौर था,
जिसका नायक था मैं, चौहान सा,
और उनके मुख – मंडल पे चाँद सक्क्षात था.

हरबराहट- घबराहट में,
उनके अंगों से मेरा छू जाना।
एक बिजली कोंध जाती थी,
जिसपे उनका पीछे हट जाना।
उस प्रेम – प्रसंग का भी एक दौर था,
जिसका नायक मैं, उग्र था चौहान सा,
और उनके मुख – मंडल पे सयुंक्ता का सौम्य था.

वो रक्त-रंजीत मुख पे,
नैनों का झुक जाना।
वो कम्पित – साँसों के प्रवाह से,
उनके वक्षों का उन्नत हो जाना।
उस प्रेम – प्रसंग का भी एक अपना दौर था,
जिसका नायक था मैं, व्याकुल चौहान सा,
उनके मुख – मंडल पे, भय से ग्रसित प्रेम – गुहार था.

 

यादे ह्रदय को छत – विछत कर देती हैं,
लेकिन यादें सुखद हो तो, गम मिटाने का काम करती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

उम्र के इस ढलान पे


बस तन्हाई ही रह गयी,
उम्र के इस ढलान पे.
वो तेरे यौवन का रस,
वो तेरे वक्षों पे मेरे अधर.
बस एक कसक सी रह गयी,
साँसों में,
उम्र के इस ढलान पे.
जिन गेसुओं में उड़ा था,
कभी भौंरा बनके मैं.
इस आजाद अम्बर के उपवन में,
नस – नस में फिर उस कैद की,
चुभन सी उठ रही, उम्र के इस ढलान पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ और हुस्न


इश्क़ वो दुआ है दोस्तों,
जिसकी कोई सुनवाई नहीं।
क्यों की?
हुस्न के आगे कोई और बेवफाई नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अभी अधरों को वक्षों पे लगाया था


अंग – अंग खिल कर,
हिमालय हो गए हैं.
वो कहती है,
की ये नाजुक बड़ी है.
अभी – अभी अधरों को,
वक्षों पे लगाया था.
और वो हैं की,
उनपे चोली कस रही हैं.
अभी सिलवट तक टूटी नहीं,
और चादर भी कोरा ही है.
मैंने जुल्फों को बस,
अभी छुआ ही तो था.
और वो हैं की अपनी,
चुनर समेटने लगीं हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जिस पे रख देती थी वो अपना दुप्पटा


वो क्या समझेंगें इश्क़ को?
जिनकी उम्र गुजर गयी.
हमारी जवानी तो बंध कर रह गयी,
कालेज के उस दीवार से.
जिससे चिपक गयी थी वो सहम के,
या शायद शर्म से,
जब थमा था हमने उन्हें अपने बाँह में.
वो क्या समझेंगें इश्क़ को?
जिन्होंने प्राप्त कर लिया महबूब के जिस्म को,
हमारी तो नजर टिकी रह गयी,
आज तक कालेज के उस दिवार पे.
जिस पे रख देती थी वो अपना दुप्पटा,
जब कसता था मैं उन्हें अपनी बाँह में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहीं चोली मेरी खुल गयी


दिले – नादानी में,
कई कहानी बन गयी.
कहीं चुनर मेरी ढलकी,
कहीं चोली मेरी खुल गयी.
किसी के निशाने पे थी मैं,
तो किसी के निशाने पे था दिल.
किस -किस को संभालती,
थी बड़ी मुश्किल।
नई-नवेली मेरी जवानी में,
कई कहानी बन गयी,
कहीं पायल मेरी टूटी,
कही मेरी कमर ही टूट गयी.
रस पी कर,
उड़ गए सारे ही भौरें।
मैं बनना चाही जिसकी,
वो सौतन मेरी ले आएं.
कच्ची पगडण्डी पे,
कई कहानी बन गयी.
कहीं तिजोरी मेरी लूटी,
कही मैं ही पूरी लूट गयी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरा खाट अभी तक कुंवारा है


तू माँ बन गयी चार बच्चों की,
मेरा खाट अभी तक कुंवारा है.
तेरे हुस्न का चर्चा गली-गली में,
मेरे कुंवारेपन का ढिंढोरा है.
जगमग करते महल में,
तू सोती है दिया भुझा के,
मेरे जीवन में बस अँधियारा है.
चालीस में भी बलखाती है तू,
जाने किसको रिझाने को,
मेरे बुढ़ापे का अब तक ना कोई सहारा है.
तू माँ बन गयी चार बच्चों की,
मेरा खाट अभी तक कुंवारा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू माँ बन गयी चार बच्चों की


मैं आशिक़ हूँ तेरी नजरों का,
रहता हूँ मयखाने में,
तू माँ बन गयी चार बच्चों की,
मैं बैठा हूँ बंजारों में.
जाने क्या मिल गया तुझे?
चंद लकीरें मिटा कर.
सोना – चाँदी से तन तेरा शोभे,
हम जुगनू बन रह गए अंधेरों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

I just need your strong biceps


You cannot be a man,
Until you hold my waist.
It does not mater,
How old you are?
I just need your strong biceps.
You cannot be a man,
Until you hold my waist.
All diamonds and rings,
I can scarify to be your dream.
It does not matter,
How poor you are?
I just need a strong house.

 

Parmit Singh Dhurandhar