तुम्हारी जवानी का नशा ही ऐसा है प्रिये,
बस आँखों ने संभाला है मुझे।
टकटकी लगी है तुम्हारे वक्षों पे,
सावन भी उतर आया है जिसपे खेलने।
परमीत सिंह धुरंधर
Every thing is related to love and beauty
तुम्हारी जवानी का नशा ही ऐसा है प्रिये,
बस आँखों ने संभाला है मुझे।
टकटकी लगी है तुम्हारे वक्षों पे,
सावन भी उतर आया है जिसपे खेलने।
परमीत सिंह धुरंधर
कोई मिलता ही नहीं, जिसे अपना कह सके,
तन्हाई में कट रहीं हैं ये चांदनी राते।
किसको नहीं है शौक ओठों के जाम का,
बेबसी बन गयीं हैं ये जवानी की साँसे।
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे अश्कों पे तुम्हे मुस्कुराना आ गया,
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
जिसकी सत्ता है, तुम शौक़ीन उसकी,
चंद सिक्कों पे, तुम्हे आँचल ढलकाना आ गया,
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
नियत तुम्हारी हमसे अच्छा कौन समझेगा?
जिसे दौलत की चमक पे थिरकना आ गया.
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
औरत को वफादार लिखने वालों की कलम,
पे मुझे शक है,
जिन्हे चार दीवारों के अंदर चादर बदलना आ गया.
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
परमीत सिंह धुरंधर
तहार चोलिया के तोड़ के बटन रानी,
आज कहबू त हो जाइ खुले – आम रानी।
ऐसे भी जानअ ता सारा ई जवार रानी,
तहार चोलिये में फँसल बा हमार जान रानी।
परमीत सिंह धुरंधर
यारो मैं प्यार करूँगा उस लड़की की बाहों में,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
मेरा इंतजार जो करती हो चूल्हे और चौखट के बीच में,
चैन ना हो, जब तक आवाज घुंघरू की मेरे बैलों के,
पड़ ना जाये उन कानों में.
यारों मैं अंक भरूंगा उस लड़की के अंगों से,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
जो बिना मुझे खिलाएं, ना खाये एक अन्न का भी दाना,
बिना मेरे मुस्कान के, ना खनके पायल जिसके पावों में.
यारों मैं तो रंग डालूंगा उस लड़की के वक्षों पे,
जिसके सपनों में बस हम हों,
और कोई ना हो उन आँखों में.
परमीत सिंह धुरंधर
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.
ऐसे जोश में ना होश गवाईं राजा जी.
चूड़ी टूटल, केसिया खुलल,
अब का साड़ी खोलेम राजा जी?
तनी लोक-लाज,
शरम कुछु त अ बचाईं राजा जी.
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.
पोरे -पोरे देहिया के तुड़ के रखनी,
कहिया समझेम,
इ शरीरिया भी ह हाड़ -माँस राजा जी?
तनी बैठे ना दीं,
फुरसत में दुगो घड़ी राजा जी.
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.
जाने माई का -का समझा के भेजली,
रउरा आगे कउनो उपाय ना बाचल राजा जी.
तनी देहिया पे रहेदी साड़ी राजा जी.
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.
छोड़ी अब गइल छपरा और सिवान,
अँगना में रहीं आ खाईं गरम-गरम राजा जी.
तनी हमरों के लुटे दी जवानी राजा जी.
तनी धीरे -धीरे, तनी धीरे -धीरे,
दौड़ाई ई टमटम राजा जी,
हचका मारे,
त अ दुखे कमरिया राजा जी.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
नश -नश में मेरे है बिहारीपन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मैं शिष्य रहा हूँ Prof. Sitaramam का,
किया हैं उनसे ही विज्ञान का अध्यन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
नित प्रातः करता हूँ,
गुरु गोबिंद जी को नमन.
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मैंने किया है लालजी सिंह के समक्ष,
भोजपुरी में गायन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
पहुँचा हूँ यहाँ तक, छूकर,
माता – पिता, गुरु Kasbekar के चरण.
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मुझे लावणी है बहुत ही पसंद।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मेरे ह्रदय में बसते है,
लाला, करद, पवार, मराठी मानुस गन.
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मेरी प्रियतमा है गावं की,
अनपढ़ -गवार एक धोबन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
मुझे भाता है उसका अल्हड़पन।
मैं बिहारी हूँ, मैं बिहारी हूँ,
वो जो मुस्करा के हाँ कह दे तो,
ले जाऊं उसे बिहार, बना के दुल्हन।
परमीत सिंह धुरंधर
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
तुम्हे सैंडल भी दिलाऊंगा,
तुम्हे गहने भी पहनाउंगा।
लेकिन पहले सम्भालो आके,
मेरा चूल्हा – चौकी – चाका,
तू लम्बी, मैं नाटा।
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
तेरे ओठों से लगा के,
हर रंग चखूँगा.
तेरी जुल्फों से बांध के हर,
खवाब रखूँगा।
लेकिन पहले सीख ले चलाना,
बेलन – छुरी -काँटा,
तू लम्बी, मैं नाटा।
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
तुझे दिल्ली भी घुमाऊंगा,
तुझे पिक्चर भी दिखाऊंगा।
लेकिन पहले सीख ले बनाना,
आलू – बैंगन – कांदा,
तू लम्बी, मैं नाटा।
दो – चार किलो दही,
दो – चार किलो आंटा।
आ बसा लें गृहस्ती,
तू लम्बी, मैं नाटा।
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी के कुछ पल ही सही,
मशहूर हुए थे हम भी तो.
वो पल भी कितना न्यारा था,
करीब थे किसी के हम भी तो.
ऐसी कोई शाम नहीं गुजरती थी,
जब वो घुघंट न करती थीं.
वो पल भी कितना प्यारा था,
घुघंट उठाते थे हम भी तो.
उनके चहकने, चहचहाने से,
सुन्दर थी ये बगिया भी.
वो पल भी कितना अपना था,
किसी को सताते थे हम भी तो.
परमीत सिंह धुरंधर
बेगम – जान हो, हमारी तुम बेगम -जान हो,
हम हैं सुखल छुहारा तुम पहलवान हो.
खाती हो, खिलाती हो, धौंस भी दिखती हो,
बीस बरस की शादी के बाद भी,
सोलह सी सरमाती हो.
दो बच्चों की अम्मा,
तुम अब भी बड़ी नखरेबाज हो.
बेगम – जान हो, हमारी तुम बेगम -जान हो.
हम हैं सुखल छुहारा तुम पहलवान हो.
मन की सच्ची हो, कान की कच्ची,
पुरे मोहल्ले की सहेली हो तुम पक्की।
पल में हवा में महल बना देती हो,
बात – बात में मायके का करती गुमान हो.
दो लड़कियों की अम्मा तुम अब भी कच्ची -कचनार हो.
बेगम – जान हो, हमारी तुम बेगम -जान हो.
हम हैं सुखल छुहारा तुम पहलवान हो.
परमीत सिंह धुरंधर