बेगम – जान


आवsअ दिल के दिल से करार करके,
तहरा के बेगम – जान कह दीं.
तू पीसsअ सरसो हमार सिलवट पे,
हम घर-दुआर सब तहरा ही नाम कर दीं.
जहिया से देखनी रूप तहार पनघट पे,
प्यास उठल बा अइसन इह मन में,
की मन करे पनघट पे ही घर कर दीं.
आवsअ तहरा अधर-से-अधर जोड़ के,
तहके आज आपन प्राण -प्यारी कह दीं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वफ़ा


उम्र गुजर जाए तेरी बाहों में,
फिर मुझे मेरी मौत का गम नहीं।
एक रात दे दे, वफ़ा की सच्ची में,
फिर तेरी वेवफाई का मुझे रंज नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

योगी जी के सरकार बा


तहरे कमर के बल पे, योगी जी के राज बा,
केकरा में बा अतना गुद्दा, जे रख दी तहरा पे हाथ हाँ.
त घुघंट उठा के चल अ, जोबन उछाल के चल अ,
मन करे त, अब लहंगा उठा के चल अ.
तहरे नजर के तीर पे, गिर गईल सरकार अखिलेश के,
केकरा में बा अतना गुद्दा, जे छू दी तहार एगो केश हाँ.
त पयाल बजा के चल अ, कंगन खनका के चल अ,
मन करे त, अब चोली से चुनर गिरा के चल अ.
तहरे जोबन के जोर पे योगी जी के सरकार बा,
केकरा में बा अतना गुद्दा, जे मुँह खोली तहरा खिलाफ हाँ.
तहरे कमर के बल पे, योगी जी के राज बा,
केकरा में बा अतना गुद्दा, जे रख दी तहरा पे हाथ हाँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चरचराये खटिया और चुये पलानी


अइसन तहार जोबन ये रानी,
की चरचराये खटिया और चुये पलानी।
आरा, छपरा से बलिया तक,
तहरे किस्सा, तहरे कहानी।
बलखाये अइसन तहार कमर,
की पुरवा में उठे पछुआ के लहर.
दिल्ली छोड़ के तहरे खातिर,
दुआर ओगरतानी।
जहिया कह देबू, घर से उठालेम,
मर्द अइसन हइन,
जेकर अभियों बाटे खाटी पानी।
अइसन तहार जोबन ये रानी,
की चरचराये खटिया और चुये पलानी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे ह्रदय में एक दरिंदा धड़कता है


मुझसे मत पूछो यारों,
मेरे पास दिल है की नहीं।
दिल तो कब का टूट गया २००३ में,
अब तो मेरे ह्रदय में,
एक दरिंदा धड़कता है.
अब मौका मिले तो,
दबोच लूँ, खरोंच दूँ.
कहीं दन्त, तो कहीं नख के,
निशान छोड़ दूँ.
अश्रुओं की धारा में,
मैं भी उसकी मोहब्बत को,
तड़पती, विलखती,
चीत्कारती छोड़ दूँ.
मेरी मोहब्बत को जब,
उसने तार-तार किया चौराहे पे.
तब से मेरे मनो-मस्तिक में,
ये नंगापन बस गया है.
और मेरी हसरतों में,
अब बस सिर्फ हवस-ही-हवस है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हर स्तन शिशु का आहार नहीं होता


पाकर हुस्न को, इतराना छोड़ दो.
वफ़ा और हुस्न का, कभी साथ नहीं होता।
जितनी भी राते, चाहे साथ गुजार लो
ह्रदय में हुस्न के, कभी एक समय,
कोई एक नहीं होता।

वही मेनका, वो ही शकुंतला,
हर स्तन शिशु का आहार नहीं होता।
नस-नस में इनके मक्कारी है भरी,
इनके चेहरे से ये नकाब नहीं गिरता।
जब दिल टुटा मेरा तब मैंने जाना,
क्यों हुस्न पे किसी का एतबार नहीं होता?

 

परमीत सिंह धुरंधर

तुमसे बच्चे कर लुंगी


तुम्हे अपनी नजरों से इसारे कर दूंगी,
ना माने अगर बाबुल तो भी तुमसे बच्चे कर लुंगी।
दुनिया चाहे जो भी नाम दे दे मुझे,
पति को दे के जहर, तुम्हारी ता – उम्र गुलामी कर लुंगी।
एक सनक सी सवार है मस्तक पे मेरे,
तुझे पाने के लिए, हर गुनाह कर दूंगी।
रहती हूँ भोली – भाली सी घर – शहर में,
मगर तुझे अपना बनाने को, कमीनी बन लुंगी।

कुछ लोग सनकी होते हैं. उनके मस्तक पे एक सनक सवार होती है. तूफ़ान भी आ जाए, और अगर वो निकल चुके हैं घर से तो , वापस नहीं लौटेंगे। वो मिट जाएंगे, दुनिया हँसेगी, लेकिन उनको अपनी सनक, अपनी मौत से ज्यादा प्यारी है. ऐसे लोगो की हार नहीं होती, भले दुनिया उन्हें हारा हुआ समझे। ये लोग भले ज्यादा दिन न रहे, राज न करे, पर जब तक होतें हैं, एक बंटवारा तो हुआ रहता है समाज का उनके नाम पे, उनके काम पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ कर लो


गुनाहों के चादर को कब तक समेटोगे,
इश्क़ कर लो, इससे बड़ा कोई गुनाह नहीं होता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Theory of Relativity


Two beautiful eyes were besides me, thats how, sometime, you end your tiring day. And the result is you get up at 5.49 AM even if you slept 1.30 AM.

 

Parmit Singh Dhurandhar

मंडप


हम दोनों के परिवार वाले नहीं मान रहे थे. इसलिए आज नदी किनारे हम दोनों भविष्य के भावी कदम  उठाने के लिए मिले थे. मेरे परिवार के सख्त विरोध की बात सुनकर उसने अपना क्रोध इस तरह ब्यक्त किया की साड़ी गलतिया मेरी ही परिवार वालो की निकलने लगी.
सुरोधी: ” तो तुम परिवार वालों के चलते मुझसे शादी नहीं करोगे। इतने दिन तक फिर ये सब क्या था? मेरे शरीर से खलने के बाद परिवार वालों का ख़याल आया. परिवार वालों से पूछ लेते पहले फिर मेरे तन पे हाथ रखते। तुम वासना से ग्रसित हो, अगर प्यार रहता तो अब परिवार की बात नहीं करते।”
मैं:”मगर क्या तुम अपने परिवार के खिलाफ जाओगी?”
सुरोधी: ” मैं तुम्हारे लिए सब कुछ छोड़ सकती हूँ. मेरा प्यार सच्चा है. तुम्हारी तरह शरीर का भूख नहीं। सब मर्द कुत्ते होते हैं.”
अंततः मैंने तय किया की परिवार के खिलाफ जाके सुरोधी को अपना बनूँगा। सुरोधी ने मुझे गले लगा लिया।

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6 महीने से मैं अपने परिवार से अलग रह रहा हूँ, कोई बात चित नहीं। इस बीच सुरोधी ने हर बार मेरी शादी की बात को टाल दिया। पिछले महीने मैंने उससे बिना पूछे ही कोर्ट में शादी का आवेदन कर दिया। आज शादी की तारीख मिलने पे, मैं सीधे सुरोधी के घर उससे बताने बताने पहुचा। सोचा पहले तो वो गुस्सा होगी पर बाद में खुश होगी ये जानकार की मैं सिर्फ उसके शरीर के पीछे नहीं हूँ.
दरवाजे को सुरोधी की छोटी बहन ने खोल और वो मुझे देख के सकपका गयी. अंदर काफी लोग थे और अचानक मुझे एक जोरदार धक्का लगा. सामने सुरोधी की सगाई का सामारोह चल रहा था, और उसकी हाथों में सगाई की अंघुठि जगमगा रही थी. उसके चेहरे पे सर्द हवाएं छाने लगी, मुझे देख कर. मैंने उसको बधाई दिया और वहाँ से निकल गया. भाड़ी क़दमों से चलता हुआ मैं बस यही सोच रहा था क्यों किया उसने ऐसा मेरे साथ. शायद लोगों ने सही कहाँ है लडकिया ऊँचे पेड़ पे चढ़ा के गिराती हैं. उन्हें बिना घर तोड़े किसी का, मंडप में बैठना पसंद नहीं है.

For the Valentine’s Day

परमीत सिंह धुरंधर