लक्ष्य और कर्ण


ए दिल,
ए दिल,
उड़-उड़,
के देख ले,
सपना है तेरा।
टूट जाए,
मिट जाए,
क्या जाता है तेरा।
यूँ ही, तू तो,
ठुकराया हुआ है,
यूँ ही, तू तो,
कितनी रातो से,
सोया नहीं।
तो उठ-उठ,
के मार,
लक्ष्य है तेरा।
जीते,
न जीते तू,
कट जाए,
मिट जाए,
क्या जाता है,
परमीत तेरा।

नारी


एक नारी का,
अपमान हुआ.
वीरो के सभा में,
खुले आम हुआ.
नेत्रहीनो ने भी,
बंद कर ली आँखे.
इंसान का,
ऐसा पतन हुआ.
ससुर-बहु,
पिता-पत्नी,
हर एक रिश्ता,
शर्मशार हुआ.
भारत की पावन,
धरती पे,
वेदो के,
ज्ञानियों के समक्ष,
ब्राह्मणो ने लाज,
मिटा दी.
और,
राजपूतों ने अपना पौरष.
जुल्फों से घसीटा,
एक अबला को,
और,
स्तन पे उसके,
प्रहार हुआ.
जिस तन ने,
सींचा है शिशु को,
उस तन पे,
भीषण वार हुआ.
पतियों ने किया,
पत्नी का,
वय्यापार जहाँ,
सत्ता के,
सत्ताधीशों ने,
न्याय के,
पालनहारों ने,
फिर उसको,
वासना का बाजार दिया.
जब छीनने लगा,
आँचल तन से,
और,
आभूषण उतरने लगा,
न वीरों के सभा,
में किसी ने,
मुख खोला.
न आँगन से ही,
प्रतिकार हुआ.
जब दर्द और,
अपमान से, परमीत
एक नारी ने,
चीत्कार किया.

 

माँ का लाल


तेरे वास्ते ए माँ, मैं लौट के हाँ आऊंगा,
न तू उदास हो, मैं रण जीत के ही लौटूंगा।
आज समर में देख ले, ज़माना भी बढ़ के,
क्या द्रोण, क्या कर्ण,
सबको परास्त कर के ही लौटूंगा।
तेरा दूध ही मेरे शौर्य का प्रतीक है,
और क्या चाहिए, जब मुझपे पे तेरा आशीष है.
ना कृष्णा का, ना अर्जुन का,
मैं बस परमीत, लाल माँ तेरा कहलाऊंगा।

धर्मराज


जहाँ पतियों ने खेली बाजी,
अपनी किस्मत बदलने को,
और दावँ पर लगाया पत्नी को,
बस खुद को बचाने को.
जब हुआ अपमान उस स्त्री का,
तो नजरे झुका ली सबने, परमीत
बस धर्मराज कहलाने को.

भीष्म-अभिमन्यु


मूंद रही आँखे,
देख रही थी,
पिता को आते.
की पिता आके,
बचा लेंगें.
अंतिम क्षणों तक,
इस उम्मीद में,
लड़ा अभिमन्यु,
पिता-पुत्र का रिश्ता,
कुछ ऐसा ही है,
एक तरफ भीष्म गिरें हैं,
तो एक तरफ जूझ,
रहा है, परमीत, अभिमन्यु.

मैं उस पिता का पुत्र हूँ


मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो धरती पे किसी से हारा नहीं,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो उर्वशी पे भी डिगा नहीं।
खडग उठा लिया है जब,
तो करो मेरा सामना महारथियों,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जिसका तीर कभी चूका नहीं।
शिशु समझ के मौत का भय,
किसको दिखा रहे हो,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो रण में शिव से भी डरा नहीं।
तुम उन्माद में हो अपने शौर्य के,
मैं जवानी में चढ़ के आया,
रौंद के हर दिशा से जाऊँगा तुम्हे,
ये अपनी माँ से मैं कह के आया।
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जिसका रथ कभी रुक नहीं।
मैं उस पिता का ‘परमीत’ पुत्र हूँ,
जिसका धवज कभी झुका नहीं।

अभिमन्यु


काश तुम होते हमारे साथ पिता जी,
तो हम यूँ अकेले न होते।
इस मोड़ पे जिंदगी के,
यूँ तन्हा-तन्हा न होते।
अभिमन्यु बढ़ा है,
तुम्हारी शान में,
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल इस मैदान में,
जग करता रहेगा,
तुम्हारा गुणगान पिता जी,
काश तुम होते हमारे साथ पिता जी।