माँ, मुझको पति चाहिए


माँ, मुझको पति रूप में,
बस वो एक खत्री चाहिए।
माँ, पिता को भी अब ये,
बात पता चलनी चाहिए।
मत पूछ की उसमे ऐसा है क्या?
रोबीला, छबीला, गठीला है वो हाँ.
शातिर है, चालक है, चालबाज है वो,
मुझे ऐसा ही मर्द खतरनाक चाहिए।
माँ, पिता को भी अब ये,
बात पता चलनी चाहिए।
आँखों से जो मदहोस कर दे,
बाहों में लेके जो खामोश कर दे.
तारे, चाँद, ना ये सितारे चाहिए,
बस खत्री के आँगन में एक खाट चाहिए।
माँ, पिता को भी अब ये,
बात पता चलनी चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

त्रिया-चरित्र


गली – गली में देखा तुझको,
गली – गली में शोर है.
सैयां मेरी आँखों को,
तू लग रहा एक चोर है.
कल से गायब मेरी चुनर हैं,
और चोली भी तंग है.
सैयां मेरी आँखों को,
तू लग रहा एक चोर है.
तू तो हो गयी है वावरी,
उस पड़ोसन की सुन – सुन के.
उसके त्रिया-चरित्र का,
ये सब एक नया झोल हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

आपन गावं के चिड़िया रहनी


अइसन -वइसन खेल ए राजा,
मत खेल आ तू हमारा से.
आपन गावं के चिड़िया रहनी,
लुटले रहनी कतना खेत बाजरा के.
जाल बिछा के कतना शिकारी,
रहलन हमरा आसरा में.
अइसन घुड़की मरनी,
हाथ मल आ तारन आज तक पांजरा में.
अइसन -वइसन चाल ए राजा,
मत चल आ तू हमारा से.
आपन गावं के खिलाड़ी रहनी,
कतना के पटकनी दियारा में.
ढुका लगा के बइठल रहलन,
कतना चोर चेउंरा में.
अइसन दावं मरनी,
आज तक दर्द उठेला उनकर जियरा में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो प्रतिकार करना होगा


ये कैसी जिंदगी है, जो दर्द से भरी हैं.
आँखों में काजल है, वो भी आंसू से भींगी हैं।
ओठों पे है लाली, कानो में है बाली,
खनकती है पायल, पर अपने ही आँगन में नौकर बनी है.
थामा था जिसने हाथ, लेके फेरे हाँ सात,
पर एक रात के बाद ही, उसके बिस्तर पे लाश सी पड़ी है.
जिसकी हाँ कमर पे, कितने मर मिटे,
जिसकी एक झलक पे, कितने दीवाने थे मचले,
आज उसी के अंगों पे, खून की नदी है.
तो प्रतिकार करना होगा, ऐसे इंसानो का,
जिनकी नजर में, औरत सिर्फ एक बेबसी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रिश्तेदार मुझसे, मेरे नाराज हो गए हैं


रिश्तेदार मुझसे, मेरे नाराज हो गए हैं,
जब से हम अपनी दुल्हन के संग हो गए हैं.
मौलवी-पंडित, सब परेशान हो गए हैं.
जब से हम अपनी बीबी संग खुलेआम हो गए हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यार और परवाह


बचपन में बहन, माँ से ज्यादा,
जवानी में माँ, महबूबा से ज्यादा,
और बुढ़ापे में बीबी, बच्चों से ज्यादा,
प्यार, और परवाह करती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हम एक धागे में बंध के


मुझे हर रिश्ता पसंद है तेरी आँखों से होकर,
आ जुल्म-सितम सब सह लें, हम एक धागे में बंध के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

यूँ ही धरा पे ये भीषण ठंड रहे


यूँ ही धरा पे ये भीषण ठंड रहे,
और तू यूँ ही मेरी बाहों में सिमटती रहे.
तेरी साँसे जीवित रखें मेरी नसों को,
यूँ ही मेरे रुधिर को गर्मी देती रहें।
मेरी पलकों पे तेरी ओठो का भार रहे,
बस एक रात ही सही सोनिये,
तेरी अधरें मेरी अधरों का आधार बनें।
ऐसे फिर रसपान करता रहूँ रात भर,
की जीवन भर गुमान रहे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

14 फेब्रुअरी (प्रेम-दिवस) और सौगात


घर छोटा था, छत छोटी थी. परिवार बड़ा था. पहला पाठ जो सास ने पैर रखते पढ़ाया था की किसी का दिल मत दुखाना चाहे कष्ट जितना भी हो. अब काम करते-करते, नहाते -कपडे धोते, सूरज सर पे आ जाता था और अब अपनी ढलान पे था. अपने कपड़े सुखाने के लिए उससे कोई जगह नहीं सूझ रही थी इसलिए उसने देवर के के कपड़े उत्तर कर अपने डाल दिए. उन कपड़ो को उसने प्यार से सहेजा, संवारा और रात को सब काम निपटा के, उनको खिला के, उसके कमरे में देने गयी. वह टेबल पे कुछ पढ़ रहा था. उसने कपड़े उसकी टेबल पर रख दिए. उसके पूछंने पे की आपने क्यों उतरा, उसने कहा, “अरे इतना भी हक़ नहीं मेरा।” धीरे-धीरे वो कपडे देने के बाद थोड़ा वह सुस्त लेती थी, दिल हल्का कर लेती थी. दिन भर चलने के बाद वह उसे एक पेड़ मिलता था जिसकी छाँव में वो सुस्त लेती थी. अब तो वो उस पेड़ से अपनी बाते भी कहती और कभी सो लेती थी. इधर उसको यूँ कमरे में ना पा कर उनको अजीब लगता, बेचैनी बढ़ती, शक बढ़ता जो धीरे -धीरे उनके मन के आँगन में पनप रहा था. उसकी हंसी उस कमरे से निकल कर अब उनके आँगन में पनपे पौधे को सींच रही थी. अब तो उसके चेहरे पे एक अलग ख़ुशी देख के उनका पेड़ एक चक्रवात सा महसूस करता। अब उसका यूँ रातो को सजना, तेल लगाना उनको अखरता। पेड़ धीरे -धीरे सींचते, बढ़ाते अब बलसाली बन चूका था, गगन को छू रहा था.

आज भी १४ फेब्रुअरी को वो सज के इंतज़ार कर रही थी. आज उसने पहले ही कपड़े जा के दे दिए थे. उसने ही कुछ दिन पहले बताया था की आज का दिन ख़ास है प्यार के लिए. इसमें अपने ख़ास को कुछ ख़ास सौगात देते हैं. उसने ही समझाया था की कैसे आसान है उसके लिए ये ख़ास दिन मनाना की सुको कोई रोकेगा नहीं। लेकिन बहार उस जैसे लोगो के मिलने पे, समाज-सुधारक, चिल्लाने लगते हैं, लाठी चलाते है, शादी करवा देते है. सीधी सी औरत, जिसकी दुनिया छोटी थी, उसने कुछ नहीं कहा और सपने सजाने लगी की वो भी अपना प्रेम -दिवस मनाएगी। आईने में अपने केसुओं को देखते इंतज़ार कर रही थी, उनके आने का, अपने सौगात मांगने का और उनको सौगात देने का. वो आये, दरवाजा खोला, बिस्तर पे बैठे, वो मुड़ी, इठलायीं, जूठ्मूठ का मुह बनाया। उन्होंने एक कागज़ का बण्डल निकला, उसको हाथ में दिया। उसने इधर-से-उधर उसको पलटा और टेबल पे रखते पूछा, ” ये क्या है? और कहाँ थे अब तक, मैं इंतज़ार कर रही थी?” उसने कहा तुम्हारे लिए है और मुझे हस्ताक्षर कर के दे दो.
उसने कहा,” क्या है लेकिन ये?” उसने एक जबाब दिया,”तलाक के कागज़।”

 

परमीत सिंह धुरंधर

हमर सुकुमार देहिया पे ई पहाड़ भइल बा


पहलवान भइल बा सैयां हमार,
पहलवान भइल बा.
लूट अ ता खेत में आ,
दुआर पे धुंआधार भइल बा.
ना कोई आगे – पीछे जे पगहा बाँध दी,
खुल्लम -खुल्ला अब त ई साँढ़ भइल बा.
पहलवान भइल बा सैयां हमार,
पहलवान भइल बा.
दिन – रात खा ता हरियरी-पे – हरियरी,
सुखल भूसा पे मरखा भइल बा.
जाने का देख के बाबुल बाँध देहलन,
हमर सुकुमार देहिया पे ई पहाड़ भइल बा.
पहलवान भइल बा सैयां हमार,
पहलवान भइल बा.
टंकी सा चल जाइन, एने-ओने,
त उठा ले ता आसमा, जी के जंजाल भइल बा.
पहलवान भइल बा सैयां हमार,
पहलवान भइल बा.
लूट अ ता खेत में आ,
दुआर पे धुंआधार भइल बा.

 

परमीत सिंह धुरंधर