श्रृंगार


वो रातो का श्रृंगार,
मेरी आँखों से करती हैं.
इश्क़ हो ना हो मुझे उनसे,
मगर वो मुझसे बहुत प्यार करती हैं.
ये सच है की हमारा मिलन,
परिवार वालों ने कराया था.
मगर अब वो जन्मो की,
जानी-पहचाननी सी लगती हैं.
मुझे कहाँ याद आती है उनकी,
दोस्तों की भीड़ में.
मगर सहेलियों के बीच,
वो मेरा ही चर्चा चलाती हैं.
दिन में कहाँ फुर्सत है उनको,
की पास आके मेरे बैठें.
वो तो बस छू कर ही,
अपना हाले-दिल सुनाती हैं.
मैं तो चिल्लाते रहता हूँ,
हर घडी, उनका नाम,
एक पल जो ना सुनाई दूँ उनको,
तो दौड़ी-दौड़ी चली आती हैं.
वो रातो का श्रृंगार,
मेरी आँखों से करती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

दुल्हन और दहेज़


दुल्हन ने जो घूँघट उठाई,
हर बाराती बहक गया.
मगर दूल्हा,
एक दहेज़ के लिए,
उस दुल्हन को छोड़ लौट गया.
मैंने तो हाथ बढ़ाया,
उसी मंडप में उसे थाम लेने को.
मगर मेरी मुफलिसी और ये गरीबी,
उस दुल्हन ने भी अपना मुख मोड़ लिया.

परमीत सिंह धुरंधर

घोंसला


तुझे प्यार करेंगे,
सारी रात करेंगे।
बुलबुल बन जा तू,
गुलशन में राज करेंगे।
तिनका-तिनका जोड़ के,
बनाएंगे फिर एक घोंसला।
तू करना जहाँ मनमानी,
हम तेरे गुलाम बनेंगे।
तुझे प्यार करेंगे,
सारी रात करेंगे।

परमीत सिंह धुरंधर

दुखिया


तानी सुनी न दिलवा के बतिया,
कोरा-कोरा मन बा, कोरा रे रतिया।
ए भोला तानी सुनी ना,
का कह अ तारी दुखिया।
गावें-गावें खेलनी,
सावन के झूला भी,
सब सखियाँ के गोद भरल,
बस रह गैनी हम ही,
कोरा-कोरा हमर आचार, कोरा रे देहिया।
तानी सुनी न दिलवा के बतिया,
कोरा-कोरा मन बा, कोर रे रतिया।
ए भोला तानी सुनी ना,
का कह अ तारी दुखिया।

सैया


सैया देलन एगो गुलाब अंखिया से अंखिया लड़ाके,
फिर त अ सो नहीं पायी मैं, बहियाँ में उनके जाके।
सखी कैसे कहीं सब बात, सब लूटा देहनी होश गवां के।
ना मैं कुछ बोल पायी, ना आँखे खोल पायी,
भाया तो मुझे कुछ नहीं पर ना मैं परमीत को रोक पायी।
सैया पहनाने लगे चूड़ी अंखिया में अंखिया डाल के,
फिर सो नहीं पायी मैं, बहियाँ में उनके समा के।

नथुनिया दिलाई ना


तानी दूर-दूर से ए बालम धुरंधर जी,
नयनन में प्यार जगाई ना,
खेत कहीं नइखे भागल जात,
कहियो आँगन में खाट बिछाई ना.
कब तक बहेम खुदे बैल नियर,
कभी हमके भी छपरा घुमाई ना.
चूल्हा-काठी करत, हमार कमर टूट गइल,
गेहूं-धान बोआत, राउर उम्र हो गइल,
कब तक करेम इह दुनियादारी,
कभी गंगा में भी संगे नहाईं ना.
अरे बबलू बो, गुड्डू बो के, देख के जियरा जले,
एगो बालम के कमाई पे, रोजे सजाव दही कटे,
दौलत बचा के का होइ,
कभी एगो नथुनिया, हमें दिलाई ना.

साजन


कब तक मैं देखूं दर्पण को,
ए माँ कह दे बाबुल से,
अब मुझे पराया बना दें.
तू जो देती है यूँ रोज-रोज,
नयी-नयी मुझे चूड़ियाँ,
वो भी पूछती है रातों को,
कब बजेगी मेरी शहनाइयां.
कब तक मैं सोऊँ यूँ किवाड़ भिड़ा के,
ए माँ कह दे बाबुल से,
अब मुझे डोली में बिठा दें.
भाभी छेड़ती है,
घींच के चुनार मेरी,
सखिया पूछती है चिठ्ठी में,
कब मैं पता बदलूंगी.
कब तक मैं निकलूं, काजल लगा के,
ए माँ कह दे बाबुल से,
अब मुझे परमीत सा साजन दिला दें.