गुलाब


रिश्ते टूट कर भी,
चमक रखते हैं,
माँ कितनी भी दूर हो,
उसकी दुवाओं में बस हम बसते हैं.
लूट गयी उनकी नज़र,
बड़ी ख़ामोशी से,
लेकिन शहर वाली की नज़र में,
हम लुटेरे दीखते हैं.
सब पूछते हैं की भूल क्यों नहीं जाता,
अब क्या कहें की, गुलाब की पंखुड़िया भी,
उनके अधरों से डोलतें हैं.
अब तो ख़्वाबों में भी रुक गया हैं आना-जाना,
किस्मत बदलने पे अपने भी पराये लगते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

दूध


रफ़्तार मेरी बढ़ती जा रही है,
पर सांस है की उखड़ती नहीं है.
जाने माँ ने कैसे दूध पिलाया है,
दुश्मनो के बीच में भी,
मेरी आवाज दबती नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


तस्वीरें खुदा की भी सजने लगी हैं,
जब से मेरी माँ मुस्कराने लगी है.
बहारों का तो पता नहीं,
पर आँगन में मेरे तितलियाँ उड़ने लगी है.
वो ही सूरज की किरणे, तन को जलती हैं,
वो ही पसीने की बुँदे, तन को भिगोती है.
मगर मधुर हवाएँ अब चलने लगी हैं,
जब से मेरी माँ मुस्कराने लगी है.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


एक पल जो रात कटे पलकों में उनके,
तो खुद तेरी खातिर मैं हज हो आऊँ.
पर एक पल भी मैं दूर रहूँ अपनी माँ से,
तो मेरी आँखों को खुदा तू दीखता नहीं।
एक पल को जो रौंद दूँ जामने को,
तो सनम तेरी लबों को चुम ले परमीत,
पर एक पल भी मैं दूर रहूँ अपनी माँ से,
तो सनम तेरी लबों में वो मिठास नहीं।