जहाँ माँ ही मिठाई भी है


बुलंदियों का नाम है गरीबी,
जो टूटे ख़्वाबों में भी जिन्दा रखती है.
ये ऐसा दर्द है,
जो अमीरों की बस्ती में नहीं,
गरीबों  के साथ रहती है.
जहाँ काटती है,
माँ आज भी अपने पेट को.
अपने बच्चे की भूख मिटाने के लिए.
नौ माह का ये दर्द नहीं,
जो सेव-अंगूरों से मीट जाए.
ये तो वो ममता है, जो
उम्र भर एक फटी साड़ी में पलती हैं.
एक माँ की कहानी है गरीबी,
जो रौशनी में नहीं, मैगज़ीन के कवरों पे नहीं,
टूटी चारपाई, और जुगनू में चमकती है.
जहाँ उबलते नहीं हैं चावल,
बिना हाथ, चूल्हे में जलाए।
जहाँ पकती नहीं है रोटी,
बिना चक्की में जवानी पिसाय।
जहाँ चढ़ती नहीं है, जवानी,
बिना माँ के हाथ से खाये।
जहाँ पचता नहीं पानी भी,
बिना माँ के लोरी सुनाय।
की एक जन्नत सी है गरीबी,
जहाँ माँ ही मिठाई भी है.
ये ऐसी मोहब्बत है यारों,
जो अमीरों की किस्मत में नहीं,
बस गरीबों की झोली में हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यार


जो अपनी माँ से प्यार नहीं करते,
वो अपने बच्चों की माँ से प्यार कैसे करेंगें?
और जो अपने बच्चों की माँ से प्यार नहीं करते,
वो क्या अपनी माँ को प्यार करेंगे?

 

परमीत सिंह धुरंधर

मुसाफिर की किस्मत में


मुसाफिर की किस्मत में,
माँ का सुख कहाँ?
लड़कियों की चाहत,
ताउम्र सफर की,
उनका एक मुकाम कहाँ?
जो मान लेते हैं,
झटपट अपने बेगम की हर ख्वाइस।
ऐसे शौहर को क्या पता?
की बेगम के शौक क्या -क्या?
और नजरें कहाँ – कहाँ?

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं मजदूर था कभी


मैं मजदूर था कभी,
जब मेरे अपने खेत थे.
मैं मजदूर था कभी,
जब मेरे अपने बैल थे.
हाँ, मैं भी मजदूर था,
जब मेरे अपने बाग़ थे.
मैं मजदूर था कभी,
जब मेरी दुकानें,
मेरे खलिहान थे.
अब तो मैं बस एक बंजारा हूँ.
चूल्हा जलता था,
हाँ दिए की मद्धम रौशनी में.
रोटी पकती थी,
वो बंट जाती थी,
आते – आते अपनी थाली में.
मगर,
आती बड़ी मीठी नींद थी,
पछुआ के उस ताप में,
माँ के उस थाप में.
अब तो व्यंजनों का भण्डार है,
हर थाली में जैसे एक त्योंहार है.
मगर अब छोटी रातें,
और लम्बी थकान हैं.
मैं एक मजदूर था,
जब माँ सोती नहीं थी,
माँ, एक – एक रूपये का तह लगाती थी.
आज, मैं सिर्फ एक मजबूर हूँ,
जब तहखानों में रूपये है,
मगर माँ नहीं है,
और बीबी उठती नहीं है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यार और परवाह


बचपन में बहन, माँ से ज्यादा,
जवानी में माँ, महबूबा से ज्यादा,
और बुढ़ापे में बीबी, बच्चों से ज्यादा,
प्यार, और परवाह करती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत में थोड़ी- बहुत ममता का होना बहुत जरुरी है


हर मोहब्बत में थोड़ी- बहुत ममता का होना बहुत जरुरी है, वरना वो मोहब्बत, मोहब्बत न होकर, वासना, काम, लोभ और प्रतिशोध बन जाता है. इसलिए तो माँ सर्वश्रेष्ठ है देवों से भी, क्योंकि माँ गलती या पाप होने पे भी उसकी सजा नहीं देती। माँ तो गले लगाती है फिर भी. लेकिन, देवता देते हैं, भाई! ऐसा कोई रिश्ता नहीं है, चाहे पिता, भाई, बहन, दादा, दादी या गुरु का ही रिश्ता हो, जो बिना ममता के बहुत दिनों तक जीवित रह सके!

 

परमीत सिंह धुरंधर

त्रिदेओं से बड़ी है ममता तेरी


त्रिदेओं से बड़ी है ममता तेरी,
ये माँ तू ही है विधाता मेरी।
मैं यूँ ही तेरी चरणों में जीता रहूँ,
तू खिलाती रहे, मैं खाता रहूँ।
तेरी आँचल में हैं जन्नत मेरी,
तुझी से है दुनिया मेरी।
तू यूँ ही मुझे संभालती रहे,
मैं मुस्काता रहूँ, मैं हँसता रहूँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ के हाथों में दौलत बहुत है


जी रहा हूँ इस शहर में बस तेरा जिस्म देख के,
जिसपे रेशम का दुप्पटा फिसलता बहुत है.
लूटा दी अपनी सारी खुशियाँ,
परदेस में जिस दौलत को कमाने में.
उसे कमाने के बाद हम ये समझे,
की माँ के हाथों में दौलत बहुत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ का इरादा है


माँ का इरादा है,
की मुझको सवारें।
माँ का इरादा है,
की मुझको खिलाये।
माँ की आँखों की,
बस ज्योति मैं ही हूँ.
माँ ने अपनी आँखों का टीका,
बस मुझको ही लगाया है.
फिर कैसे तेरे योवन पे,
अपनी माँ को भुला दूँ.
माँ ने,
मेरे लिए चुल्ल्हा जलाया है,
माँ ने मेरे लिए,
रात के तीन बजे पुआ पकाया है.
अपनी हाथों को जलाकर,
मुस्कराकर, माँ ने मुझे,
भर पेट खिलाया है।
फिर कैसे तेरे अंगों पे,
माँ के छाले भुला दूँ.
ए हुस्न,
मेरी हसरत नहीं,
तुझको पाने की.
वो नासमझ थे,
जिन्होंने तेरी मोहब्बत में,
आसूं  बहाएं।
मैं उन सितारों में नहीं,
जो अंधेरों में छोड़कर माँ को,
बस तेरा आँचल सजाए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


भगवान गणेश जी, भगवान श्री कृष्णा जी और भगवान हनुमान जी, सभी महान बने क्यों की उनका बचपन बस माँ और उनके हाथों से बने खाने को खाने में गुजरा। माँ के हाथ और उसके हाथ से बने खाने की महिमा इसी से समझी जा सकती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर