माँ,
ईस्वर का रूप है.
माँ,
सर्द मौसम में घूप है.
माँ है,
तो मीठी है भूख.
माँ,
मिठाई का संदूक है.
परमीत सिंह धुरंधर
माँ,
ईस्वर का रूप है.
माँ,
सर्द मौसम में घूप है.
माँ है,
तो मीठी है भूख.
माँ,
मिठाई का संदूक है.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं अपनी माँ की चरणों को,
गंगा समझता हूँ,
मुझे धर्म से क्या लेना देना,
मैं तो रोज ये तीर्थ करता हूँ.
मैं अपनी माँ की बोली को,
गीता समझता हूँ.
मुझे वेद-पाठ से क्या लेना देना,
मैं तो ये ही कर्म रोज करता हूँ.
मैं तो अपनी माँ के हाथों के खाने को,
प्रसाद समझता हूँ,
मुझे कथा-वाचन से क्या लेना देना,
मैं तो रोज ये ही पुण्य कमाता हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
रफ़्तार मेरी बढ़ती जा रही है,
पर सांस है की उखड़ती नहीं है.
जाने माँ ने कैसे दूध पिलाया है,
दुश्मनो के बीच में भी,
मेरी आवाज दबती नहीं है.
परमीत सिंह धुरंधर
तस्वीरें खुदा की भी सजने लगी हैं,
जब से मेरी माँ मुस्कराने लगी है.
बहारों का तो पता नहीं,
पर आँगन में मेरे तितलियाँ उड़ने लगी है.
वो ही सूरज की किरणे, तन को जलती हैं,
वो ही पसीने की बुँदे, तन को भिगोती है.
मगर मधुर हवाएँ अब चलने लगी हैं,
जब से मेरी माँ मुस्कराने लगी है.
परमीत सिंह धुरंधर
एक बार मुझे उठ के लड़ जाने दे मेरी माँ,
तेरी आबरू, तेरी आरजू सब सवारूँगा.
हंस के रौंद गए हैं जो हमें,
उनके हर निसान को मिटा के जाऊंगा.
रख न सका जो इस जुबान को,
तो तेरी चरणों में सर कटा के जाऊंगा.
फिर से लहलहाएगी हरियाली,
फिर से तेरा दमान खुशहाल होगा,
ऐसे सजाऊंगा तेरा आँचल,
तेरे सर पे सोने का ताज होगा.
एक बार मुझे उठ के लड़ जाने दे मेरी माँ,
हर तरफ तेरा जय – जैकार होगा.
माँ ने कहा था बचपन में,
तू लाल मेरा है लाखों में.
दुनिया मुझ पे हंसती रही,
पर माँ ने चूमा माथे पे.
आँचल में बिठाया,
बाहों में उठाया,
एसे रखा मुझे,
जैसे कोई रत्न रखा हो,
दुनिया से छुपा के.
समय इतना बदल गया,
मैं राजा से रंक बन गया.
हर रिस्ता टुटा मेरा प्रेम में,
फिर भी रखती है माँ धुरंधर,
को सीने से लगा के.
तेरे वास्ते ए माँ, मैं लौट के हाँ आऊंगा,
न तू उदास हो, मैं रण जीत के ही लौटूंगा।
आज समर में देख ले, ज़माना भी बढ़ के,
क्या द्रोण, क्या कर्ण,
सबको परास्त कर के ही लौटूंगा।
तेरा दूध ही मेरे शौर्य का प्रतीक है,
और क्या चाहिए, जब मुझपे पे तेरा आशीष है.
ना कृष्णा का, ना अर्जुन का,
मैं बस परमीत, लाल माँ तेरा कहलाऊंगा।
एक पल जो रात कटे पलकों में उनके,
तो खुद तेरी खातिर मैं हज हो आऊँ.
पर एक पल भी मैं दूर रहूँ अपनी माँ से,
तो मेरी आँखों को खुदा तू दीखता नहीं।
एक पल को जो रौंद दूँ जामने को,
तो सनम तेरी लबों को चुम ले परमीत,
पर एक पल भी मैं दूर रहूँ अपनी माँ से,
तो सनम तेरी लबों में वो मिठास नहीं।
कोई समझता नहीं है,
ममता के आँचल को,
किस्मत बदलती है,
बस माँ दोस्तों।
वो दबाते रहे तलवे,
मौलवियों- शंकराचार्यों के,
मैंने चूमा चरण एक बार माँ के,
सितारे चमकने लगे हैं,
मेरी कदमो में आके.
कोई समझता नहीं है,
ममता के आँचल को,
हर विघ्न बेटे का,
हरती है बस माँ दोस्तों.
कोई समझता नहीं है,
ममता के आँचल को,
किस्मत बदलती है,
परमीत, बस माँ दोस्तों.
मांगता नहीं हूँ मैं,
किसी से,
दुआ जिंदगी कि,
सलामत है जब तक,
साँसे मेरी माँ कि.
सागर कि लहरें चाहें,
डूबा दें किनारा,
तोड़ नहीं सकती हैं,
वो मेरा हौसला.
आसमाँ जला दे चाहें,
गिरा कर बिजलियाँ,
नहीं मिटा सकती है,
वो मेरा काफिला.
डरता नहीं हूँ मैं,
देख के,
भीड़ दुश्मनों कि,
सलामत है जब तक,
साँसे मेरी माँ कि.
मांगता नहीं हूँ मैं,
किसी से,
दुआ जिंदगी कि,
सलामत है जब तक,
साँसे मेरी माँ कि.