कौन कहता है?


जब स्वर्ण, आभूषण, और स्वर्ग हो सामने,
तो भूखी – बिलखती, नन्ही सी शकुंतला,
आँचल से छूट ही जाती है.
कौन कहता है की?
भारत की धरती पे नारियाँ,
सती, सीता और सावित्री हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

I am a poor man


I am a poor man,
Willing to love.
But she wants
A heavy pocket
And, a diamond.

I want to bring
Happiness in her life.
But her heart beats
Only for silver and gold.

 

Parmit Singh Dhurandhar

 

 

You have to be my heart


You have to be my heart,
Then the melting will start.
I will be a sky,
And you will be my star.

Together, we can evaporate,
To make a cloud and a rainbow,
And we will defeat the bask.

 

Parmit Singh Dhurandhar

नीलकंठ


आँखों में हैं इरादे तो मंजिल मिल ही जायेगी,
सपनों की चाहत तुझे गैरों में बसायेगी।
ये तेरी हार नहीं है राही की तू जो ये ठोकरों में है,
तेरी ये ही जज्बात तुझे शिखर पे ले जायेगी।
मत विचलित हो यूँ अपमान – पे – अपमान मिलने से,
गरल का ये पान ही तुझे नीलकंठ बनाएगी।
होंसले बुलंद रहे अगर तेरे यूँ ही,
तो अंधकारों के इस तिमिर में भी,
एक-न-एक दिन उषा अपनी लालिमा बिखेरेगी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जुल्म


इश्क़ कभी मत करो जुल्म की जंजीरों से,
यहाँ तख़्त बदल जाते हैं, जंजीरे नहीं बदलती।
सीखना है मोहब्बत तो सीखो हुस्न की आँखों से,
जिसके आशिक़ बदलते हैं हर रात, अदायें नहीं बदलती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हमारी लाज रे


पिता तुम तो हो कैलाश पे,
मैं हूँ यहाँ निराश रे.
तन – मन थकता ही जा रहा,
छोड़ गए विष्णु-ब्रह्मा सब साथ रे.

विकट प्रण धारण कर,
मैं निकला था शान में.
कंठ मेरे सुख चले अब,
और संकट में हैं प्राण रे.

साँसों को अब कोई आस नहीं,
ह्रदय में विश्वास नहीं।
तुम पुलकित कर दो ये पुष्प,
प्रचंड इन धाराओं में,
और रोक दो मेरा मान-मर्दन, उपहास रे.

हम रघुबंशी, हम सूर्यबंशी,
फिर भी कुल है आज कलंकित मेरा।
नाथ बनो, सनाथ करों, हे त्रिपुरारी,
अब तुम्हारे कर कमलों में हैं हमारी लाज रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सर्वोत्तम भार्या


नित संवर कर जो मन को लुभाती हो,
सीने से लग कर जो हर दर्द हर लेती हो.
भार्या वही सर्वोत्तम है जो हर स्थिति में,
अपने चौखट पे हर पल मुस्काती हो.

उषा का जो आँगन में स्वागत करे,
निशा को जो नयनों से चंचल करे.
भार्या वही सर्वोत्तम है जो हर स्थिति में,
जो सेज पे सखी सा सम्मोहित कर लेती हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो श्रवण बन जाओ


सरसों के खेतों में संस्कार नहीं मिलते,
आम के बगीचों में पुरस्कार नहीं मिलते।
समझना है अगर खुद को और पाना है रब को,
तो फ़कीर बन जाओ.
यहाँ यशोधरा तो मिलती हैं महलों में,
पर बुध नहीं मिलते।

किस्मत, कुँवारी किसी की नहीं,
दुल्हन में समझदारी, किसी की नहीं।
पाना है अगर सच्ची मोहब्बत,
तो श्रवण बन जाओ.
पैसा और वक्त, यहाँ, मित्र, शत्रु, पत्नी,
क्या – क्या नहीं बदल जाते।
बस एक माँ को नहीं बदल पाते।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक समुन्द्रों का


यूँ ही नहीं मुझे शौक समुन्द्रों का,
कभी कभी तो उतरता हूँ लहरों में.
प्यास तो दरिया भी मिटा दे,
पर फेंक भी तो देती है किनारों पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ताजमहल


मैंने चाहा है तुझे आवारा बनके,
तू मिटा दे मुझे अब बेवफा बनके।

माना की हसरते तेरी महफ़िल में कितनो को,
मगर तुझे भी कोई ठग जाएगा,
किसी दिन तेरा अपना बनके।

हुस्न की बिसात सिर्फ दो-रातों की,
जितना जलना है तू जल ले, शमा बन के.

तेरे यौवन से बढ़के कोई यौवन आएगा एक दिन ,
जो ले जाएगा तेरे परवाने को अपना कह के.

ताजमहल बनाते है जो इश्क़ में उन्हें क्या पता?
कितनो को दफ़न किया है तुमने सजना कह के.

 

परमीत सिंह धुरंधर