ये एक दर्द रखता हूँ


इंसानियत में फ़र्ज़ रखता हूँ,
गुनाहों में सब्र रखता हूँ.
वो जो हँसते हैं मुझपे,
बस उनकी ख़ुशी के लिए,
ये एक दर्द रखता हूँ.

हुस्न को देख लिया है इतने करीब से,
की अब इश्क़ में मौन रखता हूँ.
वो चाहे जितने भी लिख लें,
सीता – सावित्री के किस्से।
मैं केवल मेनका – ये एक शब्द लिखता हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रास्ता


तुम मुझसे शहर का रास्ता पूछते हो,
मैं तो खुद भटक रहा हूँ,
और तुम मुझे सफल बताते हो.
तो सुनो कह रहा हूँ,
की मेरी माँ कहीं है, और मैं कहीं हूँ,
और तुम मेरे परिवार का हाल पूछते हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

उनके दुप्पटे को अपने नाड़े से बांधते


गावं के वो बगीचे आम के,
जिसपे बंदरों के झुण्ड खेलते।
गांव के सड़कों पे अनगिनत कुत्ते,
अँधेरी रातों में दौड़ते और भोंकते।
वो बैल नाद पे, वो गाय बथान में,
वो घूर, वो अलाव तापते।
वो थोड़ी सी आग, आँगन से मांगते,
वो रहर का खेत, जिसे हम अगोरते।

वो लड़कियों का समूह में,
बलखाते, खिसियाते, हँसते, और झेंपते।
वो शादियों में लड़कियों को टापते,
वो उनके दुप्पटे को अपने नाड़े से बांधते।
मेरी गालों पे हल्दी – दही का लगाना,
और हम उनपे सब्जी के छींटे उड़ाते।
वो नहर पे, बगीचे में दुपहर के,
वो चक्की पे आंटे के, घोनसार में उनसे सटते,
उनसे चिपकते।
आते – जाते राहों में, उनको हाले – दिल सुनाते।

सुना है, अब गांव भी बदल गया है,
ये सब अब एक गुजरा कल हो गया है.
अब दोपहर हो या शाम,
व्हाट्सप से लोग हैं दिलों को जोड़ते।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अलार्म


जिंदगी में अकेला पड़ गया हूँ,
तन्हाई में तन्हा पड़ गया हूँ.
दोस्तों के नाम पे बस,
एक घड़ी ही रह गयी है साथ में.
जिसके अलार्म को मैं अनसुना करने लगा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

दुआएं और दवाएं बेकार गयीं


अश्कों के ढेर के नीचे,
हूँ मैं दबा हुआ.
किसी ने आग लगाने की कोसिस की,
और उसकी सारी तीलियाँ बेकार गयीं।

इस कदर दिल टुटा है मेरा,
की दोस्तों की दुआएं और सारी दवाएं,
सब बेकार गयीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

खटमल बन गइल बा इ खाट रजऊ


रखलीं हमारा के रतिया में पास रजऊ,
की खटमल बन गइल बा इ खाट रजऊ.
चूसअता खून हमार अंग – अंग से,
पोरे – पोरे देता इ दाग रजऊ.
पूरा होत नइखे निंदिया कहियों हमार,
टूट जाता रोजे कच्चे ख्वाब रजऊ.
रखलीं हमारा के रतिया में पास रजऊ,
की खटमल बन गइल बा इ खाट रजऊ.
अइसे मत काटअ जवानी विरह में,
मिलल बा इ जीवन बड़ा ख़ास रजऊ.
कब तक रहेम सन बन के चाचा – चाची,
पलना में दे दीं एकठो लाल रजऊ.
ना त बुढ़ापा में हो जाएम टुअर – टॉपर,
छोड़ दीं इ सत्ता और ताज रजऊ.
रखलीं हमारा के रतिया में पास रजऊ,
की खटमल बन गइल बा इ खाट रजऊ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


यूँ ही नहीं उन्हें शौक है मेरे अश्कों का,
हर किसी को मेरी मौत का इंतज़ार है.
अपनी मंजिलें छोड़कर,
वो रखते हैं नजर बस मेरी राहों पे.
हर किसी को यहाँ मेरे गिरने का इंतज़ार है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पौरष


जीवन वही है,
जिसमे धाराएं हों.
पेड़ वही है,
जिसमे शाखाएं हों.
नारी वही है,
जिसमे वफ़ाएं हों.
कब तक सोओगे गहरी निंद्रा में,
पौरष वही जिसके पथ में बाधाएं हों.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जाने ह्रदय में किसका नाम लिए?


अधरों पे मुस्कान लिए,
वक्षों पे गुमान लिए.
वेणी उसके नितम्बों पे,
सम्मोहन के बाण लिए.

आँखों में सागर की लहरें,
मुख-मंडल पे अभिमान लिए.
पतली कमर पे यौवन उसके,
हिमालय का भार लिए.

चंचल है वो हिरणी सी,
मादकता का भण्डार लिए.
बलखाती है, लहराती है,
जाने ह्रदय में किसका नाम लिए?

 

परमीत सिंह धुरंधर

वीणा में तार जैसे


मुख मोड़ कर खड़ी है,
समझाऊं कैसे?
दिल तोड़ कर खड़ी हैं,
मनाऊं कैसे?
कमर पे चोटी लटके,
वीणा में तार जैसे।
बीच में लक्ष्मण रेखा पड़ी है,
पास जाऊं कैसे।

 

धुरंधर सिंह

 

These lines were written by my father Dhurandhar Singh.