थालियाँ रुलायेंगी


इश्क़ मत करिये,
नहीं तो तन्हाईयाँ रुलायेंगी।

पिता को मत छोड़िये,
वरना रुस्वाइयाँ रुलायेंगी।

माँ को मत छोडो,
वरना थालियाँ रुलायेंगी।

भाई अगर साथ ना हो,
तो खुशियाँ रुलायेंगी।

और बहन को मत भूलों,
वरना सुनी कलाइयाँ रुलायेंगी।

और इन सबको छोड़ देता है,
उसको तो जिंदगी रुलायेगी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

और चूल्हा तक बंट गया


ये समुन्दर भी मेरे थे, ये लहरें भी मेरी थी,
ऐसा जोर था मेरा की ये हवाएँ तक मेरी थी.
एक नदिया आकर मिली इन किनारों से,
और सब कुछ बिखर गया.

ये आसमा भी मेरा था, ये सितारे भी मेरे थे,
एक चाँद कहीं से निकल आया,
इन सरहदों के आँगन में,
और फिर सब कुछ बिखर गया.

ये उपवन भी मेरा था, ये मधुवन भी मेरा था,
ये भौरें भी सब मेरे थे.
एक कलि कहीं से खिल गयीं यहाँ,
और फिर सब कुछ बिखर गया.

ये खेत, ये खलिहान, ये बाग़,
सब कुछ दूर – दूर तक मेरा था.
एक डोली उतरी कहीं से,
आकर इस चौखट पे.
और चूल्हा तक बंट गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नौ – महीने में दे दूंगी एक लल्ला तुझको


शादी हो गयी बेबी की,
तो बेबी बोली, ऐ विक्की।
चल मना लें हम हनीमून,
शोर – शराबे से कहीं दूर.

मेरी कमर पे हो तेरे बाज़ू,
तेरी साँसों पे हो मेरा काबू।
सुबह – शाम के चुंबन के साथ,
चलेगा गरमा – गरम चाय पे चनाचूर।

मेरी जवानी ढल जाए,
उसके पहले संभल ले,
मैं उड़ जाऊं, उसके पहले बाँध ले.
नौ – महीने में दे दूंगी एक लल्ला तुझको,
खिला – खिला के लड्डू मोतीचूर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

भौरें


इस शहर के भौरें बहुत शातिर हैं,
इनसे नजर न लड़ाना।
तुझे गुमान बहुत है,
इन्हे अरमाँ बहुत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू गली में दुप्पट्टा गिरा के देख


तुझे गली -गली की खबर है,
हम गली – गली का शौक रखते हैं.
तू किसी गली में दुप्पट्टा गिरा के देख,
हम कैसे – कैसे शौक रखते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शहर


ये माना,
इस शहर को तेरा नशा है.
मगर ये तेरा हुस्न,
उसका जादू नहीं,
तेरी कोई अदा नहीं।
ये तो हमारा,
शहर ही जवाँ है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं किसके साथ करूँ मनुहार बलम


ऐसे टूट गया है दर्पण,
अब कैसे करूँ श्रृंगार बलम?
तुम तो ले आये हो सौतन,
छाती पे कैसे करूँ मुस्ठ-प्रहार बालम।

अदायें मेरी फीकी पड़ी,
और रंग उतरा – उतरा सा.
तुम तो चुम रहे किसी और के वक्षों को,
मैं किसके साथ करूँ मनुहार बलम.

राते काटी नाही जाती सेज पे,
दीवारों को देख के.
तुम कसने लगे हो बाजूँओं में नई दुल्हन,
मैं किसपे रखूं अंगों का भार बलम?

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

मैं नदियों से नहीं कहूंगा


मैंने समुन्द्रों से कह दिया है,
की नदियों को ना छेड़ें।
पर मैं नदियों से नहीं कहूंगा,
की वो किनारों को ना तोड़ें।

मैंने कहा है समुन्द्रों से,
वो नदियों को समझे।
उनका सम्मान करें,
उनको अधिकार दें,
उनके जज्बातों का मान रखें।

और मैंने ये भी कहा है समुन्द्रों से,
की वो इसके बदले नदियों से कोई आशा ना रखें,
वफ़ा की,
समझदारी की,
सम्म्मान की,
या उनके भावनाओं को समझने की.

और ना ही मैं नदियों से ये कहूंगा,
की वो ऐसा करने की कोसिस करें।

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक बुद्ध ढूंढ रहा हूँ


गहन अन्धकार में
एक सूक्ष्म प्रकाश ढूंढ रहा हूँ.
मैं इस भीड़ में
एक बुद्ध ढूंढ रहा हूँ.
हर ज्ञान, हर रसपान
के बाद जीवन के रहस्य को
भेद पाने का संसाधन ढूंढ रहा हूँ.
मैं इस भीड़ में
एक बुद्ध ढूंढ रहा हूँ.

 

मिले बुद्ध, तो पूंछू,
ऐसा क्या था की यशोधरा का त्याग कर
आप महान बन गए?
और सीता का परित्याग कर
राम आलोचना का पदार्थ।
मैं पूंछू, हे देव,
ऐसा क्या था की नन्हे राहुल को रोते छोड़कर,
आप सम्म्मान के अधिकारी बन गए?
और लव-कुश के पिता होने मात्र से
राम, सर्वत्र निंदा के पात्र।

 

जिसने अहिल्या का मान रखा,
जिसने एक पत्नी व्रत का पालन किया।
जिसने पिता के वचन का मान रखा,
जिसने सबसे मित्रवत व्यवहार किया।
ऐसा क्या गलत किया उस मानव ने?
जो जीवन के अंत में उसे इतनी
पीड़ा, अपमान और दुःख ने ग्रसित किया।
और आपने कैसे इस संसार में खुद को,
इन बंधनों, कलंको से मुक्त किया?

 

परमीत सिंह धुरंधर

बच्चों को सेरेलेक्स और फॉरेक्स से राहत है


ऐसा नहीं है की,
मेनका एक अपवाद है.
आज भी,
भारतीय नारी को बच्चे से ज्यादा,
विश्व – सुंदरी का ख़िताब,
और अच्छे फिगर की चाहत है.
और उनके बच्चों को,
सेरेलेक्स और फॉरेक्स से राहत है.

कौन कहता है की?
भारत की धरती पे,
नारियाँ अपने बच्चों को,
मोहब्बत, ममता और मातृत्व से पोषित करती हैं.
बच्चे बिलखते हैं,
और नारियाँ अपने जिस्म में दूध को संचित करती हैं.

कैसे कोई नारी सिखलाएगी?
अपनी संतान को नारी का सम्म्मान करना।
जब नारी को खुद रिश्तों से ज्यादा जिस्म,
और दौलत की चाहत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर