मेरी बीबी – देहाती


जब मेरी शादी होगी,
तो नाचेंगे बाराती।
मेरे शक्लो-सूरत पे,
तो कोई देख,
मेरी बीबी – देहाती।

मेरे आँखों पे होगा चश्मा,
और उसके मुख पे घूँघट लंबा।
उसको मिलेगा एक गवार,
और मुझको एक लाठी।

हंस – हंस कर, झूमेंगे,
झूम – झूम कर हँसेंगे,
वो अपनी ऊँची किस्मत पे,
और देख मेरी कामचलाऊं जोड़ी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मुझे हिमालय चाहिए


मेरी निराशा के बीज,
के अंकुरण से बनी शाखाएं,
अपने काँटों से, मेरे जिस्म को,
नोचती हैं, कचोटती हैं,
और लहूलुहान करके,
खुद को पोषित करती हैं.

मेरी आशाओं के पुष्प,
जो मेरे कमरों, आँगन में,
महफूज हैं,
उनकी सुख रही और मुरझा चुकी,
पंखुड़ियां, मेरी भावनाओं को,
को कुचल – कुचल कर,
अपनी अधूरेपन का दंश मिटा रही हैं.

और मैं,
अपने जीवन के पथ पे,
इनका बोझ उठाये,
इनको सहेजे,
इनके दिए जख्म, दंश,
से प्रताड़ित हो कर भी,
इनको साथ लिए,
बढ़ रहा हूँ.

मैं बढ़ रहा हूँ,
इसलिए नहीं की,
मुझे किसी मंजिल की अब उम्मीद है.
इसलिए भी नहीं की,
कोई, कहीं, ये भाड़ मुझसे ले ले.
इसलिए भी नहीं की मैं तेज क़दमों से,
इनको पीछे छोड़ दूँ.
इसलिए भी नहीं की,
मैं इनका बोझ नहीं उठा सकता।
इसलिए भी नहीं की मैं कहीं,
ये बोझ लेकर नहीं बैठ सकता।

बल्कि इसलिए की,
मैं अपनी बेचैनी,
से भागना चाहता हूँ.
मैं अपने बेचैन मन को,
शांत करना चाहता हूँ,
इसको बांधना चाहता हूँ,
इसको साधना चाहता हूँ.
मैं नहीं जानता कैसे करूँ?
मैंने कभी इसको साधने,
बाँधने की कोसिस नहीं की.
ना सीखा, ना सिखने की कोसिस की.

मैं भाग रहा हूँ अपने सारे बोझ के साथ,
की कही मेरे मन को भटका दूँ,
कहीं इसको उलझा दूँ.
मगर मन तो ऐसे मृगचिका की तलाश में है,
की ना इसको कुछ मिल रहा,
ना ये मुझे छोड़ रहा.
मेरे मन ने मेरे जीवन को रेगिस्तान बना दिया है.

आज पूरा रेगिस्तान नाप कर,
मैं समझा की, नशों को कसरत से नहीं,
दिव्य – पदार्थों से नहीं,
साधना से साधा जाता है.
आज मैं भाग रहा हूँ,
हिमालय तक पहुंचने को.
शायद उस वीरान, भीषण ठण्ड में,
मन का ताप थोड़ा तो कम हो.
शायद, उस शीत-प्रदेश में,
मन को जल न सही, कुछ ओस की बुँदे ही मिले।

जी हाँ, सदा सुनते आया की,
पुरखे अपने जीवन की चौथी भाग में,
हिमालय जाते थे, मुक्ति को,
मोक्ष को.
मैं तो अपने जीवन के दूसरे पहर में ही,
उस हिमालय के तलाश में हूँ.
उस हिमालय की शरण का अभिलाषी हूँ.
मैं अपने हर बोझ को साथ ले कर,
उस चिरंजीवी, अविचलित, स्थिर,
भव-संटक की तलाश में हूँ.

इसलिए चल रहा हूँ.
इसलिए रुकता नहीं।
इसलिए जीवन में अब कोई आकांक्षा नहीं।
मुझे हिमालय चाहिए।
मुझे हिमालय की आगोश चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

उनके मुख – मंडल पे सयुंक्ता का सौम्य था


वो नजरों के इसारें,
किताबों के बहाने,
वो सखियों संग चहकना।
वो देर तक प्र्रांगण में रुके रहना,
टूटे चपल के बहाने।
उस प्रेम – प्रसंग का भी एक अपना दौर था,
जिसका नायक था मैं, चौहान सा,
और उनके मुख पे, सयुंक्ता का मान था.

वो कई – कई हफ्ते गुजर जाना,
बिना मिले।
और मिलने पे,
बिना संवाद के,पल का गुजर जाना।
वो उनका बिना पसीने के,
मुख को दुप्पटे से पोछना।
और आते – जाते लोगो के मुख को,
आँखों से तकना।
उस प्रेम – प्रसंग का भी एक अपना दौर था,
जिसका नायक था मैं, चौहान सा,
और उनके मुख – मंडल पे चाँद सक्क्षात था.

हरबराहट- घबराहट में,
उनके अंगों से मेरा छू जाना।
एक बिजली कोंध जाती थी,
जिसपे उनका पीछे हट जाना।
उस प्रेम – प्रसंग का भी एक दौर था,
जिसका नायक मैं, उग्र था चौहान सा,
और उनके मुख – मंडल पे सयुंक्ता का सौम्य था.

वो रक्त-रंजीत मुख पे,
नैनों का झुक जाना।
वो कम्पित – साँसों के प्रवाह से,
उनके वक्षों का उन्नत हो जाना।
उस प्रेम – प्रसंग का भी एक अपना दौर था,
जिसका नायक था मैं, व्याकुल चौहान सा,
उनके मुख – मंडल पे, भय से ग्रसित प्रेम – गुहार था.

 

यादे ह्रदय को छत – विछत कर देती हैं,
लेकिन यादें सुखद हो तो, गम मिटाने का काम करती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं इतना टूटा हुआ हूँ


मैं इतना टूटा हुआ हूँ,
बिखरा हूँ हवाओं में.
वक्त के थपेड़ों में,
मेरा कोई खंडहर भी नहीं बचा है.
लहरों को क्या दोष दूँ?
कच्चे थे जब मेरे ही पाँव।
खूबसूरत दलदलों की ऐसी चाहत थी,
की अब कोई किनारा भी नहीं बचा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

उम्र के इस ढलान पे


बस तन्हाई ही रह गयी,
उम्र के इस ढलान पे.
वो तेरे यौवन का रस,
वो तेरे वक्षों पे मेरे अधर.
बस एक कसक सी रह गयी,
साँसों में,
उम्र के इस ढलान पे.
जिन गेसुओं में उड़ा था,
कभी भौंरा बनके मैं.
इस आजाद अम्बर के उपवन में,
नस – नस में फिर उस कैद की,
चुभन सी उठ रही, उम्र के इस ढलान पे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ और हुस्न


इश्क़ वो दुआ है दोस्तों,
जिसकी कोई सुनवाई नहीं।
क्यों की?
हुस्न के आगे कोई और बेवफाई नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हाथों में इतिहास के कई पन्ने आ गए


मेरे इश्क़ को,
एक समंदर ना मिल सका.
उनकी लहरों को कई,
किनारे मिल गए.
मेरे चरित्र का हनन करने वालो,
ज़रा ठहरो।
मेरी हाथों में भी,
इतिहास के कई पन्ने है आ गए.
तुम जो कहते हो,
की ये दो लोगो के बीच की बात है.
मैं नहीं मानता उसे,
जब सुलगती, सिसकती, सुबकती,
अपने जिस्म पे जख्म लेकर।
तुम्हारे चार दीवारों की औरत,
सड़क पे आ जाय.
तुम बजा सकते हो,
ऐसे ना मर्दों की चमक पे ताली।
क्यों की ऐसे परुषों की प्रधानता में ही,
अहिल्या को पाषाण से नारी बनने में,
कई साल लग गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ए शिव मुझको दे दो इतनी शक्ति ना


मैं समंदर को हलक से पी जाऊं,
ए शिव मुझको दे दो इतनी शक्ति ना.
सारे अमृत त्याग दूँ, और गरल पी जाऊं,
ए शिव मुझको दे दो इतनी शक्ति ना.
जीवन का हर अपमान पी जाऊं,
मुस्करा कर दुश्मनों से मिलूं।
तन्हाई हो बस मेरी, मैं अलख जगा दूँ ना.
ए शिव मुझको दे दो इतनी शक्ति ना.
अब कोई मेनका जो धरती पे अवतरित हो,
तो ना छला जाऊं, मैं विश्वामित्र सा.
राम सा मन को सयम में मैं बाँध जाऊं,
ए शिव मुझको दे दो इतनी शक्ति ना.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

भारतीय नारी कभी किसी की नहीं


भारतीय नारी कभी किसी की नहीं,
और जिसे भी उसका दम्भ है,
उसे अभी तक मिला कोई ज्ञान नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

लडकियां बन गयीं हैं बिल्ली


भारत की लडकियां,
बन गयीं हैं बिल्ली,
और लड़के, बंदर।
इस पवित्र आँगन में,
अब किसी अहिल्या के लिए,
कोई राम न बचा.
जिस्म के इस खेल में,
रह गए है बस ऋषि गौतम,
और देव इंदर।
अब द्रौपदी भी पुकारे,
को किसे ?
यहाँ तो भीम-अर्जुन,
भी टूटते हैं दुर्योधन सा जिस्म पे,
इन दीवारों के भीतर।

 

परमीत सिंह धुरंधर