चरचराये खटिया और चुये पलानी


अइसन तहार जोबन ये रानी,
की चरचराये खटिया और चुये पलानी।
आरा, छपरा से बलिया तक,
तहरे किस्सा, तहरे कहानी।
बलखाये अइसन तहार कमर,
की पुरवा में उठे पछुआ के लहर.
दिल्ली छोड़ के तहरे खातिर,
दुआर ओगरतानी।
जहिया कह देबू, घर से उठालेम,
मर्द अइसन हइन,
जेकर अभियों बाटे खाटी पानी।
अइसन तहार जोबन ये रानी,
की चरचराये खटिया और चुये पलानी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

क्षत्राणी का दूध और भगवान् शिव का आशीर्वाद प्राप्त है मुझे


बस गगन के वास्ते हो राहें मेरी,
फिर चाहे आमवस्या में हो या राहें पूर्णिमा में।
उम्र भर चाहे ठोकरों में रहूँ, कोई गम नहीं,
मगर मंजिलें मेरी राहों की हो आसमाँ में।
तारें चाहें तो छुप लें,
चाँद चाहे तो अपनी रौशनी समेट ले.
हो प्रथम स्वागत चाहे अन्धकार में मेरा,
मगर प्रथम चुम्बन उषा का हो आसमाँ में.
पाला -पोसा गया हूँ छत्रसाया में धुरंधरों के,
तो क्यों ना अभिमान हो मुझे?
लहू तो सभी का लाल है यहाँ,
मगर एक इतिहास खड़ा है मेरे पीछे।
यूँ ही नहीं तेज व्याप्त है मेरे ललाट और भाल पे,
क्षत्राणी का दूध और भगवान् शिव का
आशीर्वाद प्राप्त है मुझे।
मेरा अपमान क्या और सम्मान क्या भीड़ में?
जब तक मेरे तीरों का लक्ष्यभेदन हैं आसमाँ में.
अंक और केसुओं की चाहत में रेंगते हैं कीड़े भी,
फिर मैं क्या और और अफ़सोस क्यों ?
जब तक लहराता है मेरा विजय-पताका आसमाँ में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शहंशाये-हिन्द


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तुमसे इश्क़ करके,
हम नादान बन गए.
तुम सुरमा लगाने लगे,
हम धुंआ उड़ाने लगे.

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दरिया -ए -चिनाब


खुदा का सहारा मिला होता,
तो हम भी दरिया -ए -चिनाब होते।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शहादतों को सरहदों में मत बांटों


शहादतों को सरहदों में मत बांटों,
भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद,
भारत की आज़ादी के लिए लड़े थे,
ना की हिन्दू कौम के लिए.
सुभाषचंद्र बोस की लड़ाई ब्रिटिशों से थी,
ना की मुस्लिमों से.
फिरकापरस्त है वो लोग जो, धर्म और क्षेत्र में,
बाँट रहे हैं देशभक्तो को.
अस्फाकुल्लाह खान हों या टीपू सुलतान,
सब भारत की शान हैं.
उनकी शहादत भारत के लिए थी,
ना की मजहब और अपने कौम के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अमीर खुद -ब-खुद बन जाएंगे


मिल कर कुछ दूर तो संग चले,
हौसले खुद-ब-खुद बढ़ जाएंगे।
एक पत्थर तो तोड़े संग बैठ के दोस्तों,
रास्ते खुद-ब-खुद सरल-सुगम हो जाएंगे।
मंजिलों की चाहत नहीं,
इस कदर तन्हा कटी है जिंदगी।
बस एक कारवाँ मिल जाए,
मंजीले हम खुद बना लेंगें।

सितारें जमीं पे लाने की कोसिस करने वालो,
कभी दिलों के दर्द को मिटा के तो देखो।
इस गुलशन की खुश्बूं आसमान तक जायेगी,
कभी फूलों को भौरों से मिला के तो देखो।
हाथ थाम कर कुछ देर तो संग बैठें,
हर जख्म खुद-ब-खुद मिट जाएंगे।
कुछ और नहीं तो,
किस्से -कहानियां ही बाँट ले संग में,
अमीर तो हम खुद -ब-खुद बन जाएंगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मुस्कुराना छूट गया


जब से जावानी आई,
मुस्कुराना छूट गया.
ये दर्पण तू सखी हो गयी,
सहेलियों संग खेलना छूट गया.

ख्वाब ऐसे है जैसे,
धीमी -धीमी आंच पे तलती सब्जी,
और धीमी-धीमी आंच पे पकना,
अब मेरा ख्वाब बन गया.

सबकी नजर यूँ देखती हैं,
की अब,
धीमे पावँ चलना,
सीखना पड़ रहा है.
जो दिखाना चाहती हूँ,
वो सब छुपाना पड़ रहा है.
एक चुनर के सरकने पे,
ववाल इतना,
की गलियों-मोहल्लों में,
अब निकलना छूट गया.

मेरे अंगों पे जब फिसल जाती हैं,
जुल्फों से गिरती बुँदे।
तो आसमान के तले,
वो बरसात में भींगना याद आ गया.
जब से जावानी आई,
मुस्कुराना छूट गया.
ये दर्पण तू सखी हो गयी,
सहेलियों संग खेलना छूट गया.

The poem is inspired by a girl sitting alone in the room, looking down and thinking something which I did not get.

परमीत सिंह धुरंधर

बम-बम भोले


बम-बम भोले, बम-बम भोले,
ये कैसा है खेल जिंदगी का.
तन्हा हैं हम, अकेले हैं हम,
कोई नहीं है इस जीवन का.

तुम तो कैलास पे विराज गए स्वामी,
मुझे यूँ धरती पे अकेला छोड़ के.
तुम तो आँखें मुद ध्यान में लीं हो गए,
मुझे दर्द में, पीड़ा में छोड़ के.
बम-बम भोले, बम-बम भोले,
ये कैसा है खेल जिंदगी का.
तन्हा हैं हम, अकेले हैं हम,
कोई नहीं है इस जीवन का.

मुझे माटी से इतना प्रेम दे के,
मुझे माटी से दूर कर गए.
मेरी आँखों में इतना ख्वाब दे कर,
फिर क्यों इसमें इतना आंसूं भर गए?
मैं रोता हूँ, मैं चिल्लाता हूँ,
अब क्या करूँ इस जीवन का?
बम-बम भोले, बम-बम भोले,
ये कैसा है खेल जिंदगी का.
तन्हा हैं हम, अकेले हैं हम,
कोई नहीं है इस जीवन का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शिकायत


इतनी भी शिकायत न करो, की तन्हाई आ जाए,
तुम्हारे सितम के आगे मेरी परछाईं आ जाए.
जरा सोचो कभी,
कब तक मैं तुम्हें यूँ ही सहती और ढोती रहूंगी,
ऐसा न हो की,
मेरी जिंदगी में कहीं कोई और आ जाए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन क्या है?


जीवन क्या है?
नदी है, तालाब है,
धारा है, किनारा है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर बहते रहना,
चाहे अपने किनारे ही डूब जाएं,
सागर से मिलने से पहले,
अपनी सारी लहरे सुख जाएँ।

जीवन क्या है?
सत्ता है, समाज है,
सुख है, विलास है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरन्तर त्याग करते रहना,
हर दुःख के बावजूद, दूसरों के दुःख,
को मिटाने का प्रयास करते रहना।

जीवन क्या है?
सूरज है, चाँद है,
आसमान है, या तारे हैं.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर अन्धकार को मिटाने का,
और प्रकाश को फैलाने का प्रयास करना।
जब तक सबके आँगन में रौशनी न पड़े,
जलते रहना, जल कर दूसरों का अन्धकार हरना।

जीवन क्या है?
ज्ञान है, विज्ञान है,
संम्मान है, संस्कार है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर सहयोग करना,
पशु बन कर, गुरु बनकर,
सहयोगी बनकर।

जीवन क्या है?
उल्लास है, उत्साह है,
उत्तजेना है, उपकार है.
कुछ नहीं।
जीवन है निरंतर प्रयास करना,
खोज करना की हम किसी के काम आ सके.

जीवन क्या है?
वेद है, उपनिषद है,
गीता है, धर्म है.
कुछ नहीं।
जीवन हैं निरंतर प्रेम करना,
पशुओं के जीवन को भी जीवन समझना।
उनके आँसुंओं के पीछे के दर्द को समझना।

जीवन क्या है?
उत्थान है, उद्भव है,
उन्नति है, उद्देश्य है.
कुछ नहीं।
जीवन है सिर्फ नारी ही नहीं,
हर मादा का संम्मान करना।
उनके परिवार, उनके मातृत्व को समझाना।

जीवन क्या है?
होली है, दीवाली है,
ईद है, लोहरी है.
कुछ नहीं।
जीवन है हर बुराई को मिटाना,
सभयता के नाम पे, धर्म के नाम पे,
ना सताना, ना बांधना और ना रुलाना।
सती-प्रथा, बाल-विवाह की तरह,
जालिकुट्टी और आमानवीय सभ्यताओं का विरोध करना,
त्याग करना, प्रतिकार करना, बहिष्कार करना।

 

परमीत सिंह धुरंधर