शर्म भी,
अब बाजार का खेल है.
जितनी महंगी होती हैं,
तुम्हारे दूकान की चीजें।
उतना ही शर्म लेकर वो,
तुम्हारे दूकान पे मुस्काराती हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
शर्म भी,
अब बाजार का खेल है.
जितनी महंगी होती हैं,
तुम्हारे दूकान की चीजें।
उतना ही शर्म लेकर वो,
तुम्हारे दूकान पे मुस्काराती हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
वो भूल गयी हमको,
अपने इश्क़ के जद्दोजहद में.
उन्हें अब कुछ याद नहीं,
अपना घर बसाने के कसमोकस में.
मगर आज भी नहीं बदला हैं,
उनका वो एक अंदाज।
वो बाजार में मुस्काराती हैं, आज भी,
अपने आँखों में शर्म को उतार के.
परमीत सिंह धुरंधर
जिसे जिंदगी भर ग़मों ने लुटा,
उसके मुस्कराने का अंदाज तो देखो।
आंसूं निकलते भी हैं आँखों से,
तो उनके निकलने का अंदाज तो देखो।
कौन नहीं है?
जिसने नहीं कहा अपने जीने के अंदाज को.
मगर जब ये कहें,
तो इनके कहने का अंदाज भी तो देखो।
परमीत सिंह धुरंधर
सरदारों की जमीन पे कुछ गलत होता नहीं,
ये नहीं होते, तो गांधी भी यहाँ पूजे जाते नहीं।
हाल वही होता जो हो रहा है तिब्बत का,
बिना इनके बलिदानो के हम आज़ाद होते नहीं।
वो हैं की,
हमारी आज़ादी को अपनी भेंट और हक़ बताते हैं.
ये हैं की अपना सबकुछ लुटा कर भी,
आज तक कुछ भी जताते नहीं, मुह खोला नहीं।
बंटवारा जिन्होंने स्वीकार किया सरहदों का,
अगर वो इतने धर्मनिरपेक्ष थे,
तो इनका ख़याल आया क्यों नहीं?
सरदारों की जमीन पे कुछ गलत होता नहीं,
ये नहीं होते, तो गांधी भी यहाँ पूजे जाते नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
हमसे क्या पूछते हो?
किनारों पे घर कैसे बनायें?
कई शहर डूबे हैं,
इन किनारों पे बसकर।
शौक किसे नहीं,
की सागर की लहरों पे खेले।
मगर कस्तियाँ नहीं उतारते इनमे,
दिल में जुल्फों का ख्वाब रखकर।
खुदा भी उसका नहीं,
जो इश्क़ में, हुस्न पे, आँख मूंद ले.
वफाओं पे रोती हैं ये, बेवफाओं के आँगन में,
अपने वफादारों को मिटा कर.
परमीत सिंह धुरंधर