ना अपहरण, ना बलात्कार कीजिये


जिंदगी जहाँ पे दर्द बन जाए
वहीँ से शिव का नाम लीजिये।
अगर कोई न हो संग, राह में तुम्हारे
तो कण-कण से फिर प्यार कीजिये।

राम को मिला था बनवास यहीं पे
तो आप भी कंदराओं में निवास कीजिये।
माना की अँधेरा छाया हुआ हैं
तो दीप से द्वार का श्रृंगार कीजिये।

जिंदगी नहीं है अधूरी कभी भी
तो ना अपहरण, ना बलात्कार कीजिये।
माना की किस्मत में अमृत-तारा नहीं
तो फिर शिव सा ही विषपान कीजिये।

Rifle Singh Dhurandhar

नारी


एक नारी का,
अपमान हुआ.
वीरो के सभा में,
खुले आम हुआ.
नेत्रहीनो ने भी,
बंद कर ली आँखे.
इंसान का,
ऐसा पतन हुआ.
ससुर-बहु,
पिता-पत्नी,
हर एक रिश्ता,
शर्मशार हुआ.
भारत की पावन,
धरती पे,
वेदो के,
ज्ञानियों के समक्ष,
ब्राह्मणो ने लाज,
मिटा दी.
और,
राजपूतों ने अपना पौरष.
जुल्फों से घसीटा,
एक अबला को,
और,
स्तन पे उसके,
प्रहार हुआ.
जिस तन ने,
सींचा है शिशु को,
उस तन पे,
भीषण वार हुआ.
पतियों ने किया,
पत्नी का,
वय्यापार जहाँ,
सत्ता के,
सत्ताधीशों ने,
न्याय के,
पालनहारों ने,
फिर उसको,
वासना का बाजार दिया.
जब छीनने लगा,
आँचल तन से,
और,
आभूषण उतरने लगा,
न वीरों के सभा,
में किसी ने,
मुख खोला.
न आँगन से ही,
प्रतिकार हुआ.
जब दर्द और,
अपमान से, परमीत
एक नारी ने,
चीत्कार किया.