कब तक मैं देखूं दर्पण को,
ए माँ कह दे बाबुल से,
अब मुझे पराया बना दें.
तू जो देती है यूँ रोज-रोज,
नयी-नयी मुझे चूड़ियाँ,
वो भी पूछती है रातों को,
कब बजेगी मेरी शहनाइयां.
कब तक मैं सोऊँ यूँ किवाड़ भिड़ा के,
ए माँ कह दे बाबुल से,
अब मुझे डोली में बिठा दें.
भाभी छेड़ती है,
घींच के चुनार मेरी,
सखिया पूछती है चिठ्ठी में,
कब मैं पता बदलूंगी.
कब तक मैं निकलूं, काजल लगा के,
ए माँ कह दे बाबुल से,
अब मुझे परमीत सा साजन दिला दें.