Shambhavi:A promise impeccable


A promise impeccable
By me to you
A promise to be by your side true
A promise to be together by life’s
thick and thin,
A promise to love till the life’s brim,
A promise to walk hand in hand,
A promise to be honest in tiniest
strand,
A promise to be there
In your hardest times,
A promise to share your lovliest
rhymes,
A promise from dawning tday till
Tomorrow,
A promise to be here even if you
go,
A promise impeccable from me to
you

Written by the sweetest person in this world for me. Its a memory I will always cherish.

Parmit Singh Dhurandhar

विजय श्री


मैं सागर की लहरों,
को बाँध के पी जाऊं।
मगर मेरी प्यास,
तेरे अधरों से बुझती है प्रिये।
मैं हिमालय के मस्तक पे, एक ही बार में,
अपने विजय का ध्वज लहराऊं।
पर विजय श्री,
तुम्हारे बाहों में मिलती है प्रिये।
मैं बादलों को रोक कर,
सावन को बरसा दूँ।
मगर भिगनें का मज़ा,
तेरी जुल्फों में है प्रिये।
मैं पुष्पों को चुम कर,
भौरां बन जाऊं।
मगर मैं झूमता तेरी वक्षों पे हूँ प्रिये।
तू ही मुझे पूर्ण करती है,
तू ही मुझे सम्पूर्ण करती है।
तुझसे मिल कर ही,
मुझे जिंदगी मिली है प्रिये।

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे साहस की सहचारिणी


तुम ह्रदय की स्वामिनी,
धमनियों की रागिनी,
नस – नस का मेरे स्पंदन हो,
तुम हो मेरे मन की कामिनी।
चक्षुओं की मेरी रौशनी,
मेरे अधरों पे प्रज्जवलित अग्नि,
मेरे साँसों की ऊष्मा हो,
तुम हो मेरे साहस की सहचारिणी।

परमीत सिंह धुरंधर

पुणे – प्रेम


पुणे के अपने वीरान खंडहरों में,
एक आलिशान महल बनाकर।
तुम्हे अपने बाहों में भरकर प्रिये,
जब मैं चुम्बन करूँगा।
तो बादल उमड़ – उमड़ कर,
और कलियाँ कम्पित हो कर,
क्षितिज तक लालिमा प्रदान करेंगे।
जब तुम्हारी भीगी – भीगी,
जुल्फों की हर गाँठ को,
मेरी साँसें अपनी ऊष्मा प्रदान करेंगी।
तो हर दिशा से हवाएँ प्रखर हो कर,
मेरु पर्वत तक,
नस – नस में कम्पन का आवाहन करेंगीं।
बस इंतज़ार करों अपने मिलन का,
मेरे प्रेम के मधुर बाणों पे पुलकित,
तुम्हारे योवन से।
उषा से रात्रि तक,
स्वयं प्रकृति भी रंज करेंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

बस तुम मेरे साथ रहो प्रिये


बस सूरज प्रखर हो अम्बर में,
मैं हर युद्ध जीतता चला जाऊँगा।
रात चाहे जितनी लम्बी हो,
मैं रौशनी बनकर सुबहा लाऊंगा।
बस तुम मेरे साथ रहो प्रिये,
मैं हर गम को,
खुशियों का आँचल पहनाऊंगा।
मेरी भूख – प्यास सब, अब तुम्ही हो,
तुम्हारे नैनों से जीवन मेरा।
तुम यूँ हैं मुस्करा कर मिलती रहो,
मैं पतझड़ को बसंत बनाऊंगा।

परमीत सिंह धुरंधर

तेरा दिल टूटे ना


हर रिश्ता,
छूटे तो छूटे।
तेरा संग छूटे ना.
हर बंधन,
टूटे तो टूटे,
तेरा दिल टूटे ना.
पथ चाहे पथरीली हो,
या फूलों से सजी.
तेरे क़दमों पे,
मेरे जीते जी,
कोई जख्म आये ना.

परमीत सिंह धुरंधर

ये प्रेम निभा दो


तुम अपनी पलकों से,
मेरी यादों का,
हर सफर मिटा दो.
मुझे तन्हा – तन्हा करके,
मेरा संसार,
अपनी बाहों में बसा दो.
हर सुबह छलके,
तुम्हारा योवन मुझपे।
हर रात,
अपने ओठों का,
मुझे जाम पिला दो.
छोड़ के अपनी हर,
शर्म – हया को.
इन सर्द भरी रातों में,
मेरे तन पे,
अपना आँचल ओढ़ा दो.
क्या मज़बूरी,
क्या रस्मो को निभाना।
हर रिस्ता भुला के,
जीवन भर का,
ये प्रेम निभा दो.
तुम बनके मेरी शाम्भवी,
ये जीवन मेरा,
सम्पूर्ण बना दो.
तुम अपनी पलकों से,
मेरी यादों का,
हर सफर मिटा दो.
मुझे तन्हा – तन्हा करके,
मेरा संसार,
अपनी बाहों में बसा दो.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं थोड़ा – थोड़ा टूट कर तुम में मिलना चाहता हूँ


मैं नहीं जानता की प्रेम का,
इजहार कैसे और कब होता है.
मैं नहीं जानता की दिल का,
विश्वास कैसे जीता जाता है.
मैं नहीं जानता की कोमल ह्रदय को,
कैसे सहेजा और संभाला जाता है.
मगर, ये अब जान गया हूँ की,
की इन आँखों में देखते हुए,
जिंदगी को जीना चाहता हूँ.
इन आँखों में डूबकर ,
हर इक पल रहना चाहता हूँ.
इन आँखों के सपनो को,
अपना कहना, अपना बनाना चाहता हूँ.
इन ओठों की मुस्कराहट को,
सहेजना, सम्भालना चाहता हूँ.
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मुझे नहीं मालुम कब मेरी जिंदगी की,
राहें समतल होंगी।
मुझे नहीं मालुम कब बहारें मेरे,
क़दमों को चूमेंगी।
मुझे नहीं मालुम तुम कब तक,
मेरे साथ चलोगी।
मगर, मैं अब तुम्हार्री बाहें,
थामना चाहता हूँ.
हर पथरीली, कंटीली राहों पे,
तुम्हे गोद में उठा कर चलना चाहता हूँ.
अनुकूल – प्रतिकूल, वक्त के हर थपेड़ों में,
तुम्हे हँसते, खिलखिलाते, देखना,
तुम्हे सम्भालना चाहता हूँ.
तुम्हे अपनी नदी और खुद को,
तुम्हारा किनारा बनाना चाहता हूँ.
तुम्हारी धाराओं के हर मिलन पे,
मैं थोड़ा – थोड़ा टूट कर,
तुम में मिलना चाहता हूँ.
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मेरा प्रयास हो तुम,
मेरा होसला हो तुम.
मेरे आखिरी क्षणों तक,
मेरा ये ही प्रयास रहेगा।
तुम्हे पाने की,
तुम्हे मुस्कराने की.
तुम्हे सहजने की,
तुम्हे सँभालने की.
तुम्हे हर सुकून,
खुद को बेचैन रखना चाहता हूँ.
तुम्हे हर ख़ुशी,
खुद को गम देना चाहता हूँ.
मैं अपनी हर निराशा को,
तुम्हारे ओठों का ख़्वाब देना चाहता हूँ.
राते अमावस की हो या पूर्णिमा की,
मैं हर रात तुम्हारे साथ,
एक नया दीप जलाना चाहता हूँ.
मुझे नहीं मालुम तुम्हे कैसे यकीन दिलाऊं,
मगर, मैं तुम्हारे पावों को,
अपने खून की मेहंदी देना चाहता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

प्रेम


तेरी तस्वीरों को देखकर,
जीने वालों में मैं नहीं.
मेरा प्रेम तो सागर है,
इसमें किनारों का बंधन नहीं.
लहरे उठने लगीं हैं,
तुम्हे भिगोने को.
एक कदम तो तुम इधर उठाओं,
अब कुछ भी असंभव नहीं.

परमीत सिंह धुरंधर

ओ शाम्भवी


ओ शाम्भवी, वो शाम्भवी,
तुझसे ही है मेरी हर ख़ुशी।
संग ही तेरे खेलना है,
अब तो जीवन की हर होली।
सागर की लहरें हों,
और तुम हमारे साथ.
किनारों पे बैठें हम,
देखें एक साथ ये आसमान।
हर तारे की गिनती पे,
हो तेरे करीब आने का अहसास।
तेरे मिलने के बाद ही,
मेरी हर प्यास है बढ़ी.
ओ शाम्भवी, वो शाम्भवी,
तुझसे ही है मेरी हर ख़ुशी।

परमीत सिंह धुरंधर