त्वरित – तरंगों से भगीरथ सा विचलित रहता हूँ


तेरी गहरी -गहरी आँखों में,
मैं गहन – गहन अध्ययन करता हूँ.
तेरे गहन – गहन इन नयनों का,
मैं गहरा अध्ययन करता हूँ.

तेरे सुर से इन साँसों में,
मैं मदिरा का अनुभव करता हूँ.
तेरी कमर की इस लचकता पे,
मैं भ्रमर सा गुंजन करता हूँ.

कभी आ जा भी तू,
साक्षात मेरे उपवन में,
नित रात्रि में स्वपन में,
तेरा अभिनन्दन करता हूँ.
पुष्प सी पुलकित हो,
मृग सी बिचरती है धरा पे,
तेरे यौवन के त्वरित – तरंगों से,
मैं भगीरथ सा विचलित रहता हूँ.

धनुष की प्रतयंचा सी,
तू कसी- कसी सी,
मैं राम सा तुझे कसने को,
हर पल में प्रबल रहता हूँ.
घनघोर घटा सी जुल्फे तेरी,
चन्द्रमुख को ढक लेती है जब,
चकोर सा व्याकुल -विचलित,
मैं तेरी आभा को तड़पता हूँ.

तेरी गहरी -गहरी आँखों में,
मैं गहन – गहन अध्ययन करता हूँ.
तेरे गहन – गहन इन नयनों का,
मैं गहरा अध्ययन करता हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इस शहर से उस शहर तक


मेरे दुश्मनों की कमी नहीं है,
इस शहर से उस शहर तक.
ता उम्र बस यही,
दौलत तो कमाया है.
मैं भले ही नास्तिक हूँ खुदा,
पर सारे जमाने को आस्तिक बनाया है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लड़कियाँ शादी के बाद


वो जो कल तक इठलाती थीं,
अपनी अंगराई पे.
मुझे ठुकरा दिया,
किसी और की शहनाई पे.
शादी के बाद, जाने क्यों?
कुम्हलायी सी लगती हैं.
लड़कियाँ,
अक्सर शादी के बाद ही सही,
लेकिन अपनी आशिक की
परछाई को तरसती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे गावँ का पता


यूँ ही नहीं हैं बहारें मेरी किस्मत में,
मैंने कइयों को रौंदा हैं, टकराने पे.
तूफानों को भी पता है, मेरे गावँ का पता,
यूँ ही नहीं मुख मोड़ लेती हैं आंधियाँ मेरे दरवाजे से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चाहत


सफर का नशा तेरी आँखों से है,
वरना मंजिलों की चाहत अब किसे है?
मैं चल रहा हूँ की तुम साथ हो,
वरना इन साँसों की चाहत अब किसे है?

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ – बाप से अच्छी शहनाई लग रही


अपनी गलियाँ ही पराई लग रहीं,
बाबुल की लाड़ली खोई – खोई लग रही.
जाने कैसा जादू कर गया, एक परदेशी?
सखी – सहेली, सब खटाई लग रहीं।

हल्दी के चढ़ने का ऐसा असर,
माँ – बाप से अच्छी शहनाई लग रही.
सब सहने को अब है तैयार गोरी,
मायके से अच्छी, ससुराल की मिठाई लग रही.

छोटे से जीवन में क्या – क्या करें?
जीवन अब ये तन्हाई लग रही.
कैसे लड़ें, कैसे जीतें?
जब हारी हुई ये लड़ाई लग रही.

आशिक तो कब का मारा गया,
अब तो बेबस – लाचार उसकी दुहाई लग रही.
ऐसा होता है हुस्न और उसका त्रिया-चरित्र,
की सबको बस वही अबला और सताई लग रही.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरा परुषार्थ असमर्थ है


देह की कामना,
देह को नहीं, मन को है.
देह की कामना,
देह से नहीं,
उसकी नग्नता, अर्ध-नग्नता से नहीं,
बल्कि उसपे चढ़े बस्त्रों से हैं.

देह की कामना,
सिर्फ शरीर, मांस, की नहीं,
उसकी अंगराई, हया, शर्म,
और उसकी साँसों के स्पंदन से है.
देह की कामना,
सिर्फ मुझपे जवानी आने,
और मेरी मर्दानगी के आभास से नहीं,
उसके नयनों की चंचलता,
अधरों की कपकपाहट,
कमर की लचक से है.

देह की कामना,
सिर्फ दृष्टि से परिभाषित नहीं,
देह की कामना,
स्वयं नारी के वक्षों, नितम्बों,
और उसके मादक लावायण्य,
विशाल, विकसित यौवन से,
संचालित है.

अतः मैं मिलना चाहता हूँ,
जानना चाहता हूँ, उन लोगो से,
जो ऐसे कामना को,
निरीह बच्चियों,
अर्ध-नग्न, नग्न स्त्रियों में देख लेते हैं.
वो उनकी सुंदरता,
उनके श्रृंगार की तुलना,
कैसे और किससे करते है?

मैं देखना चाहता हूँ,
समझना चाहता हूँ,
उनके ख़्वाबों, मेरे खवाबों की नारी के अंतर को,
उसके अंगों, वक्षों, हया और लावण्या के अंतर को.

शायद, अब देह की कामना,
नारी की लालसा,
सौंदर्य, रूप, अंग, मादकता से नहीं,
बस इससे है की,
वो सिर्फ एक नारी, मादा या लड़की है.

शायद, अब देह की कामना,
उसके अधरों, उसके नयनों, उसके जुल्फों से नहीं,
बस इससे है की,
वो यौन क्रिया को पूर्ण कर सकती है.

मेरी कलम अब भी,
असमर्थ है उस नारी जिस्म की कल्पना में,
जो वक्ष-विहीन, लावण्या – हीन,
अर्ध-नग्न या नग्न बस एक जिस्म हो.
और मेरा परुषार्थ भी असमर्थ है,
इस लालसा, देह की कामना,
को मुझमे जागृत करने,
और मुझे वासना से बसीभूत करने को.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लड़की वो थी केरला की


लड़की वो थी केरला की,
कर गयी हमसे चालाकी।
आँखों से पिलाया हमको,
और बाँध गयी फिर राखी।

लड़की वो थी पंजाब की,
पूरी – की – पूरी शहद में लिपटी।
बड़े – बड़े सपने दिखलायें,
और फिर बोल गयी हमें भैया जी.

लड़की वो थी बंगाल की,
कमर तक झुलाती थी चोटी।
शरतचंद्र के सारे उपन्यास पढ़ गई,
सर रख के मेरे काँधे पे.
और आखिरी पन्ने पे बोली,
तय हो गयी है उसकी शादी जी.

लड़की वो थी हरियाना की,
चुस्त – मुस्त और छरहरी सी.
हाथों से खिलाती थी,
बोलके मुझको बेबी – बेबी,
और बना लिया किसी और को,
अपना हब्बी जी.

लड़की वो थी दिल्ली की,
बिलकुल कड़क सर्दी सी.
लेकर मुझसे कंगन और झुमका,
बस छोड़ गयी मेरे नाम एक चिठ्ठी जी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तलाक और ताजमहल


हर कोई ताजमहल बना रहा है,
अपने महबूब के लिए.
और फिर तलाक भी लिख रहा है,
अपने दूसरी मुमताज के लिए.
मैं वो शख्श नहीं जो समझौते करूँ,
मैंने कलम उठा ली है एक बगावत के लिए.

क्या सम्मान, क्या अपमान?
है सब सामान।
मेरी लालसा नहीं किसी तख्तो-ताज के लिए.
जवानी का मेरे ये उद्देश्य नहीं,
की राते गुजरे किसी खासम-खास के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ये एक दर्द रखता हूँ


इंसानियत में फ़र्ज़ रखता हूँ,
गुनाहों में सब्र रखता हूँ.
वो जो हँसते हैं मुझपे,
बस उनकी ख़ुशी के लिए,
ये एक दर्द रखता हूँ.

हुस्न को देख लिया है इतने करीब से,
की अब इश्क़ में मौन रखता हूँ.
वो चाहे जितने भी लिख लें,
सीता – सावित्री के किस्से।
मैं केवल मेनका – ये एक शब्द लिखता हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर