तुम मुझसे शहर का रास्ता पूछते हो,
मैं तो खुद भटक रहा हूँ,
और तुम मुझे सफल बताते हो.
तो सुनो कह रहा हूँ,
की मेरी माँ कहीं है, और मैं कहीं हूँ,
और तुम मेरे परिवार का हाल पूछते हो.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम मुझसे शहर का रास्ता पूछते हो,
मैं तो खुद भटक रहा हूँ,
और तुम मुझे सफल बताते हो.
तो सुनो कह रहा हूँ,
की मेरी माँ कहीं है, और मैं कहीं हूँ,
और तुम मेरे परिवार का हाल पूछते हो.
परमीत सिंह धुरंधर
गावं के वो बगीचे आम के,
जिसपे बंदरों के झुण्ड खेलते।
गांव के सड़कों पे अनगिनत कुत्ते,
अँधेरी रातों में दौड़ते और भोंकते।
वो बैल नाद पे, वो गाय बथान में,
वो घूर, वो अलाव तापते।
वो थोड़ी सी आग, आँगन से मांगते,
वो रहर का खेत, जिसे हम अगोरते।
वो लड़कियों का समूह में,
बलखाते, खिसियाते, हँसते, और झेंपते।
वो शादियों में लड़कियों को टापते,
वो उनके दुप्पटे को अपने नाड़े से बांधते।
मेरी गालों पे हल्दी – दही का लगाना,
और हम उनपे सब्जी के छींटे उड़ाते।
वो नहर पे, बगीचे में दुपहर के,
वो चक्की पे आंटे के, घोनसार में उनसे सटते,
उनसे चिपकते।
आते – जाते राहों में, उनको हाले – दिल सुनाते।
सुना है, अब गांव भी बदल गया है,
ये सब अब एक गुजरा कल हो गया है.
अब दोपहर हो या शाम,
व्हाट्सप से लोग हैं दिलों को जोड़ते।
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी में अकेला पड़ गया हूँ,
तन्हाई में तन्हा पड़ गया हूँ.
दोस्तों के नाम पे बस,
एक घड़ी ही रह गयी है साथ में.
जिसके अलार्म को मैं अनसुना करने लगा हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
अश्कों के ढेर के नीचे,
हूँ मैं दबा हुआ.
किसी ने आग लगाने की कोसिस की,
और उसकी सारी तीलियाँ बेकार गयीं।
इस कदर दिल टुटा है मेरा,
की दोस्तों की दुआएं और सारी दवाएं,
सब बेकार गयीं।
परमीत सिंह धुरंधर
जीवन वही है,
जिसमे धाराएं हों.
पेड़ वही है,
जिसमे शाखाएं हों.
नारी वही है,
जिसमे वफ़ाएं हों.
कब तक सोओगे गहरी निंद्रा में,
पौरष वही जिसके पथ में बाधाएं हों.
परमीत सिंह धुरंधर
समीकरण बदल रहें है भूमण्डल के,
पुष्पित – पुलकित उसके यौवन से.
दो नयन, इतने उसके निपुण,
कण – कण में रण के,
क्षण – क्षण में, हर इक पल में.
पूरब – पश्चिम, उत्तर – दक्षिण में,
तैर रहे हैं तीर, उसके तरकश के.
कट रहे, मिट रहे,
कोई अर्जुन नहीं, अब कोई कर्ण नहीं।
सब जयदर्थ सा छिप रहे,
भय लिए मन में.
अधरों पे मुस्कान लिए,
वक्षों पे गुमान लिए.
वेणी उसके नितम्बों पे,
सम्मोहन का मोहनी बाण लिए.
आतुर हो, व्याकुल हो,
सब चरण में उसके,
सब शरण में उसके,
गिड़ रहे, पड़ रहे.
आखों की आतुरता, मन की व्याकुलता,
देख पौरष की ऐसी विवशता।
देव – दानव – मानव, पशु – पक्षी,
स्वयं ब्रह्मलोक में ब्रह्मा भी,
रच रहे हैं श्लोक उसके रूप के गुणगान में.
परमीत सिंह धुरंधर
अरमाँ दिल के तुम चुराने लगे हो,
निगाहों से विजली गिराने लगे हो.
कभी तो हटाओ ये चिलमन रुख से,
की परमीत को पागल बनाने लगे हो.
हसरतें जवानी की बढ़ने लगी हैं,
तुम्हारी कमर पे नजर टिकने लगी हैं.
मत रखों किताबों को सीने से दबा के,
ये किताबें दुश्मनी का पाठ पढ़ाने लगे हैं.
ये चलना तुम्हारा, ये मुस्कराना तुम्हारा,
इसके सिवा कुछ भाता नहीं है.
हौले – हौले से रखों क़दमों को जरा,
ये वक्षों का स्पंदन मुझे बहकाने लगे हैं.
इन निगाहों से, इन लबों से,
ना रखों प्यासा हमें।
तेरी चोली के बटन पे हम,
मरने लगे हैं
परमीत सिंह धुरंधर
मुझे दर्द भी है,
मुझे इश्क़ भी है,
खुदा तू बता दे,
मुझे नशा क्यों नहीं है?
आँखों में ख्वाब भी,
आँखों में अश्क भी,
खुदा तू बता दे,
नींद क्यों नहीं है?
ये काँटे भी मेरे,
ये कलियाँ भी मेरी,
खुदा तू बता दे,
ये बाग़ मेरा क्यों नहीं है?
ये राहें भी मेरी,
ये मंजिल भी मेरा,
खुदा तू बता दे,
ये सेहरा मेरा क्यों नहीं है ?
ये सल्तनत भी मेरी,
ये तख़्त भी मेरा,
खुदा तू बता दे,
ये ताज मेरा क्यों नहीं है?
ये लोग भी मेरे,
ये गलियाँ भी मेरी,
खुदा तू बता दे,
ये महफ़िल मेरी क्यों नहीं है?
परमीत सिंह धुरंधर
मुफ्त की रोटियाँ और हुस्न की मीठी बोलियाँ,
दोनों भविष्य को बिगाड़ देती हैं.
कौन हुआ है अमीर इस दौलत को पाकर?
ये तो आने वाली नस्लों तक को बिगाड़ जाती है.
शोहरतों के किस्से कई हैं संसार में,
मगर ये शोहरतें माँ- बाप से रिस्ता बिगाड़ देती हैं.
जिन्हे गुमान है हुस्न की वफ़ा पे, वो नहीं जानते की,
नागिन बिना दर्द के केंचुल उताड़ देती है.
परमीत सिंह धुरंधर
हमें शौक मोहब्बत का, बर्बाद कर गया है,
उम्मीदे-वफ़ा उनसे, सब कुछ राख कर गया है.
जो खेलती हैं सैकड़ों जिस्म से यहाँ,
जाने कौन पंडित उसे शक्ति और संस्कृति लिख गया है?
जिसने उजाड़ा है यहाँ कई माँ का आँचल,
और पिता से उनके पुत्र को छीना है.
जो बाँट देती हैं घरों को दीवारों में,
जाने कौन पंडित उसे शुभ और गृह – लक्ष्मी लिख गया है?
परमीत सिंह धुरंधर