रसोई सम्भालूँ क्या?


तेरे मस्त -मस्त आँखों से,
कुछ ख्वाब चुरा लूँ क्या?
तू दे – दे इज़ाज़त तो आज,
रसोई सम्भालूँ क्या?
तेरे ओठों को पीने की,
रोज -रोज चढ़ी रहती है.
तू दे – दे इज़ाज़त तो आज,
चूल्हा जला दूँ क्या?
कंघी तेरी जुल्फों से,
जब बूंदों को छानती है.
गीली साड़ी में तू,
सुलगती गैंठी सी लगती है.
तू दे – दे इज़ाज़त तो आज,
सारे कपड़े धो डालूं क्या?

 

परमीत सिंह धुरंधर

ग़ालिब बना दिया


जिंदगी के शौक ने काफिर बन दिया,
मजनू बनने चला था, ग़ालिब बना दिया।
हुस्न वालो की शहर में होता है,
चर्चा मेरा एक बेवकूफ के रूप में.
क्यों की मैंने उनको,
उन्हीं का आइना दिखा दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरी नजर में तू एक गुनाहगार दिखता है


तेरा हर रिश्ता,
मुझे रात के अंधेरों में,
किया हुआ एक गुनाह लगता है.
जमाना तुम्हे चाहे जो कहे,
मान ले, लिख दे,
या समझ के समझाने लगे.
मेरी नजर में तू हमेशा,
एक गुनाहगार दिखता है.
तू जो हर किस्सा बेचता है,
डमरुं के ताल पे.
जो अपने ख़्वाबों के,
अधीन हो के विवश हैं,
उनको नचाता हैं,
तू अपने धुन पे.
गर्वान्वित हो कर,
चाहे तू खुद को चाहे जितना भी महान,
मानता है.
मेरी नजर में तू आज भी, तब भी,
एक गुनाहगार दिखता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इंसानियत


रौशनी नहीं, केवल रोशनदान चाहिए,
अब मनुष्य को बस एक मकान चाहिए।
भटके हए हैं इंसान यहाँ,
इनकी इंसानियत को एक हैवान चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन


मैं धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे जो जवान हुआ,
कितनों ने राहें बदली, कितनों ने सलवार बदलीं।
मैं धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे जो कुर्बान हुआ,
कितनों ने निगाहें बदली, कितनों ने आँगन बदलीं।
मैं धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे जो धनवान हुआ,
कितनों ने रातें काटी, कितनों ने दांत काटी।
मैं धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे जो परेशान हुआ,
कितनों ने ईमान बदली, कितनों ने पहचान बदली।

 

परमीत सिंह धुरंधर

दिया वो ही बुझाते हैं


दिया वो ही बुझाते हैं,
जो शर्म का ढिढोंरा पीटते हैं.
जहाँ जमाना चुप हो जाता है,
हम वहाँ अपनी आवाज उठाते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अजब – अजब सा प्यार हैं


अजब – अजब सी दास्तानें,
अजब – अजब सा प्यार हैं.
धोखा देते हैं सच्चे को,
और झूठे पे, जान निसार है.
अजब – अजब सी दास्तानें,
अजब – अजब सा प्यार हैं.
कोई कहता शादी,
कागज़ का एक टुकड़ा है.
किसी को मौत तक,
इस लाल जोड़े का इंतजार है.
अजब – अजब सी दास्तानें,
अजब – अजब सा प्यार हैं.
दिल और नज़रों के इस खेल में,
बस अब जिस्मों का व्यापार है.
अजब – अजब सी दास्तानें,
अजब – अजब सा प्यार हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो प्रतिकार करना होगा


ये कैसी जिंदगी है, जो दर्द से भरी हैं.
आँखों में काजल है, वो भी आंसू से भींगी हैं।
ओठों पे है लाली, कानो में है बाली,
खनकती है पायल, पर अपने ही आँगन में नौकर बनी है.
थामा था जिसने हाथ, लेके फेरे हाँ सात,
पर एक रात के बाद ही, उसके बिस्तर पे लाश सी पड़ी है.
जिसकी हाँ कमर पे, कितने मर मिटे,
जिसकी एक झलक पे, कितने दीवाने थे मचले,
आज उसी के अंगों पे, खून की नदी है.
तो प्रतिकार करना होगा, ऐसे इंसानो का,
जिनकी नजर में, औरत सिर्फ एक बेबसी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नूरे – धुरंधर हूँ मैं


जंग तो होगी,
चाहे पूरी दुनिया एक तरफ,
और मैं अकेला ही सही.
नूरे – धुरंधर हूँ मैं,
पीछे हटने का सवाल ही नहीं।
मौत का भय मुझे क्या दिखा रहे हो,
लाखो दर्द में भी जो मुस्कराता रहा,
खून उसका हूँ मैं,
झुकने का सवाल ही नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं घनघोर विरोधी हूँ


मैं घनघोर विरोधी हूँ,
चक्रवात सा.
मेरी प्रखरता,
है आज भी एक विवाद हाँ.
ना रोक सके न तोड़ सके,
ना मोड़ सके कोई.
इसलिए कहते हैं सभी की,
मेरा होगा बुरा अंजाम हाँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर