जंगे-जीत हासिल करेंगें


घरौंदें,
मिटटी के.
बनते ही हैं,
टूटने के लिए।
मगर इन्हे,
घर बंनाने के लिए।
आखिरी साँसों तक,
हम लड़ेंगे।
वो निकलें हैं,
बैठ के हाथी पे।
अपने मद में,
मतवाले।
हम नंगे पाँव ही,
ज़मीन पे खड़े होकर,
उनका सामना करेंगे।
कहता रहे जमाना,
हमें नादान,
नासमझ, नालायक।
हम अपनी,
अनुभवहीनता के बावजूद।
ये जंगे-जीत,
हासिल करेंगें।

परमीत सिंह धुरंधर

पिता


जमाने ने हमें सराहा नहीं,
और हमने कभी हार मानी नहीं।
उस तरफ हैं महफ़िलें,
और उनकी दीवालियाँ,
और हमने अभी तक जुगनुओं से,
अपनी ये दोस्ती तोड़ी नहीं।
सुख, सत्ता और खूबसूरत जिस्म की चाह में,
कुछ दोस्त उधर जाके बैठ गए।
सम्मान, दौलत और आगोश की लालसा में,
हुस्न वाले भी वहीं के होके बस गए।
झुलस रहा है मेरा तन धुप में,
और कंठ तरस गया है, दो बून्द पानी को।
वीरान और सुनसान, इन शाखाओं को,
फिर भी, जाने क्यों और किस उम्मीद में,
अभी तक हमने छोड़ा नहीं।
क्या दौलत सजों के रखें हम,
और किस लिए।
पिता के जाने के बाद,
किसी और गोद में,
जब अब तक मैं बैठा नहीं।
जमाने ने हमें सराहा नहीं,
और हमने कभी हार मानी नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

आज़ाद साँसें


ग़मों से सजी जिंदगी,
खुशहाल हैं.
अगर ये साँसें,
मेरी आज़ाद हैं.
क्या होगा,
वैसी ख़ुशी का.
जिसमे आँखे झुकीं,
और तन पे,
सोना-चांदी का,
चमकता लिबास है.
भूख से बिलखती रातें,
खुशहाल हैं.
अगर हर सुबहा पे,
मेरा इख्तियार है.
क्या होगा उन ख़्वाबों को,
देखकर,
जिसपे किसी के हुक़्म का,
पाबन्द है.
ग़मों से सजी जिंदगी,
खुशहाल हैं.
अगर ये साँसें,
मेरी आज़ाद हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

विद्रोही और प्रेम


विद्रोहियों की कोई जात नहीं होती,
इनकी कोई विसात भी नहीं होती।
पर बैठ नहीं सकते ये चैन से,
किसी भी परिस्थिति में,
इनको चैन नहीं मिलती।
अगर रोकना हैं इनको,
तो आप इनको मोहब्बत करा दो.
क्यों की वहीँ,
इनसे कोई विद्रोह नहीं होती।
उलझ के रह जाते हैं,
अपने ही दिल-दिमाग के जाल में.
भूख के खिलाफ लड़ने वाले,
विद्रोही की प्रेम में कोई औकात नहीं होती।
सिर्फ पुष्पों, सिद्धांतों, और नारी-सम्मान पे बोल के,
भारतीय नारियों का दिल नहीं जीता जा सकता।
और इनके जेब से,
सोने-चांदी के तोहफे खरीदी नहीं जाती।
तभी तो कोई स्त्री, किसी विद्रोही से प्रेम नहीं करती।
आवाज धीरे -धीरे कम हो जाती है,
घुट-घुट कर वो खुद से ही,
हतास-निराश  हो जाती हैं.
और फिर एक दिन,
किसी अनजान से मोड़ पे,
विद्रोही के प्राण ही विद्रोह कर देते हैं.
लावारिस, अंजाना,
ना कोई देखने वाला, ना पहचानेवाला,
और अंत में इस तरह, एक विद्रोही की आवाज,
अनंत में सम्मिलित हो जाता है,
उदासी और हार के आवरण में ढक कर.
और समाज फिर चल पड़ता है,
उस विद्रोही की भुला कर.
और वो नाचने लगती हैं,
रईसो के दरबार में.
जिन बेड़ियों को तोड़ने के लिए,
जीवन भर विद्रोही ने विद्रोह किया।
उन्ही को अपने गोरे और नाजुक पावों में,
घुंघरू बना कर.

परमीत सिंह धुरंधर

गरीब बनके रहना नहीं है


किसी भी हालात से डरना नहीं है,
मौत भी समक्ष हो,
तो हटना नहीं है.
चंद साँसों के लिए,
क्या समझौता करें हम,
अँधेरी राहों में भी हमें रुकना नहीं है.
तुझको मुबारक हो ए साथी,
ये गुलिस्तां,
तेरे बाहों के लिए हमें पलटना नहीं है.
धरती पे आएं हैं तो दलें जाएंगे,
या दल के जाएंगे,
भय से बंध के हमें सिकुरना नहीं है.
कुछ भी मिले या न मिले हमको,
पर अमीरों की बस्ती में,
गरीब बनके रहना नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर

रोग


बिषय ही ऐसा था,
विवाद हो गया,
सारे शहर में खुले – आम,
बवाल हो गया.
दुकानें हो गयी बंद,
और,
लोग घरों में छुप गए,
गली-गली में ऐसे,
कोहराम मच गया.
छा गए थे जो बादल,
बरसने को उमड़-उमड़ के,
वो भी छट गए,
और,
सूरज फिर से प्रखर हो गया.
देखो, कैसे अब,
आसमां का रंग बदल गया.
अमीर के घरों पे आ गए हैं तारे,
और गरीब,
जला-जला कर दिया,
हर रात गरीब हो रहा.
भूख से बिलखती एक भीड़ देखी,
जिसे, एक नेता,
आज अमीर बनने का सपना दे गया.
भैंसो पे बैठे, हँसते बच्चे,
आज उनको कोई हाथों में मोबाइल दे गया.
की शहर से फैला ये रोग,
आज गावँ-गावँ में आ गया.

परमीत सिंह धुरंधर

परिंदे


गुलशन में इतने हैं परिंदे,
क्या हैं ये सब जिन्दे?
साँसे तो चल रही हैं हवाओं की तरह,
मगर,
क्या इन हवाओं में, अब भी फूल हैं खिलते?

परमीत सिंह धुरंधर

नाजायज खुशियाँ


तेरी आँखों से शिकायत,
हर आँख कर रही है.
तेरी खुशियाँ, इतनी है नाजायज,
की हर माँ रो रही है.
कब तक रौंदेगा तू,
यों लाखो जिंदगी,
हर तरफ से अब एक ही,
ये आवाज आ रही है.
ढूंढता है जिसे तू यूँ,
दर-दर पे भटक के,
वो खुदा की नजर भी कोई,
अब रहनुमा ढूंढ रही है.

परमीत सिंह धुरंधर

सत्ता


हज़रात की तमन्ना की सरकार बना लें,
सरेआम कोहराम मचा दें.
अगर यकीन न हो तो दे दो सत्ता,
फिर न कहना की आवो थोड़ा आराम फरमा लें.

परमीत सिंह धुरंधर