Valentine’s Day and the second law of thermodynamics


I gave her a rose
He came in a car.
She chose him
As she did not want
To go to his room by walking.

We cannot create energy.
We can only transform or conserve
Energy conservation is important in the 21st century.

Rifle Singh Dhurandhar

बिहारी कौवा इश्क़ में


कौवा बोलै इश्क़ में
तुझे प्यार करूँगा लेके risk मैं.

काला हूँ पर हूँ बिहारी मैं
गोता लगाता हूँ बड़ा तीव्र मैं.

परमीत सिंह धुरंधर

14 फरवरी (#ValentinesDay)


नवम्बर का महीना था,
दिसंबर का इंतज़ार था,
वो बोलीं,
जनवरी में मेरी हो जायेंगीं।

एक चिठ्ठी पहुँची,
फरवरी में घर मेरे,
की 14 को,
वो किसी और की हो जायेंगीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मंडप


हम दोनों के परिवार वाले नहीं मान रहे थे. इसलिए आज नदी किनारे हम दोनों भविष्य के भावी कदम  उठाने के लिए मिले थे. मेरे परिवार के सख्त विरोध की बात सुनकर उसने अपना क्रोध इस तरह ब्यक्त किया की साड़ी गलतिया मेरी ही परिवार वालो की निकलने लगी.
सुरोधी: ” तो तुम परिवार वालों के चलते मुझसे शादी नहीं करोगे। इतने दिन तक फिर ये सब क्या था? मेरे शरीर से खलने के बाद परिवार वालों का ख़याल आया. परिवार वालों से पूछ लेते पहले फिर मेरे तन पे हाथ रखते। तुम वासना से ग्रसित हो, अगर प्यार रहता तो अब परिवार की बात नहीं करते।”
मैं:”मगर क्या तुम अपने परिवार के खिलाफ जाओगी?”
सुरोधी: ” मैं तुम्हारे लिए सब कुछ छोड़ सकती हूँ. मेरा प्यार सच्चा है. तुम्हारी तरह शरीर का भूख नहीं। सब मर्द कुत्ते होते हैं.”
अंततः मैंने तय किया की परिवार के खिलाफ जाके सुरोधी को अपना बनूँगा। सुरोधी ने मुझे गले लगा लिया।

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6 महीने से मैं अपने परिवार से अलग रह रहा हूँ, कोई बात चित नहीं। इस बीच सुरोधी ने हर बार मेरी शादी की बात को टाल दिया। पिछले महीने मैंने उससे बिना पूछे ही कोर्ट में शादी का आवेदन कर दिया। आज शादी की तारीख मिलने पे, मैं सीधे सुरोधी के घर उससे बताने बताने पहुचा। सोचा पहले तो वो गुस्सा होगी पर बाद में खुश होगी ये जानकार की मैं सिर्फ उसके शरीर के पीछे नहीं हूँ.
दरवाजे को सुरोधी की छोटी बहन ने खोल और वो मुझे देख के सकपका गयी. अंदर काफी लोग थे और अचानक मुझे एक जोरदार धक्का लगा. सामने सुरोधी की सगाई का सामारोह चल रहा था, और उसकी हाथों में सगाई की अंघुठि जगमगा रही थी. उसके चेहरे पे सर्द हवाएं छाने लगी, मुझे देख कर. मैंने उसको बधाई दिया और वहाँ से निकल गया. भाड़ी क़दमों से चलता हुआ मैं बस यही सोच रहा था क्यों किया उसने ऐसा मेरे साथ. शायद लोगों ने सही कहाँ है लडकिया ऊँचे पेड़ पे चढ़ा के गिराती हैं. उन्हें बिना घर तोड़े किसी का, मंडप में बैठना पसंद नहीं है.

For the Valentine’s Day

परमीत सिंह धुरंधर

14 फेब्रुअरी (प्रेम-दिवस) और सौगात


घर छोटा था, छत छोटी थी. परिवार बड़ा था. पहला पाठ जो सास ने पैर रखते पढ़ाया था की किसी का दिल मत दुखाना चाहे कष्ट जितना भी हो. अब काम करते-करते, नहाते -कपडे धोते, सूरज सर पे आ जाता था और अब अपनी ढलान पे था. अपने कपड़े सुखाने के लिए उससे कोई जगह नहीं सूझ रही थी इसलिए उसने देवर के के कपड़े उत्तर कर अपने डाल दिए. उन कपड़ो को उसने प्यार से सहेजा, संवारा और रात को सब काम निपटा के, उनको खिला के, उसके कमरे में देने गयी. वह टेबल पे कुछ पढ़ रहा था. उसने कपड़े उसकी टेबल पर रख दिए. उसके पूछंने पे की आपने क्यों उतरा, उसने कहा, “अरे इतना भी हक़ नहीं मेरा।” धीरे-धीरे वो कपडे देने के बाद थोड़ा वह सुस्त लेती थी, दिल हल्का कर लेती थी. दिन भर चलने के बाद वह उसे एक पेड़ मिलता था जिसकी छाँव में वो सुस्त लेती थी. अब तो वो उस पेड़ से अपनी बाते भी कहती और कभी सो लेती थी. इधर उसको यूँ कमरे में ना पा कर उनको अजीब लगता, बेचैनी बढ़ती, शक बढ़ता जो धीरे -धीरे उनके मन के आँगन में पनप रहा था. उसकी हंसी उस कमरे से निकल कर अब उनके आँगन में पनपे पौधे को सींच रही थी. अब तो उसके चेहरे पे एक अलग ख़ुशी देख के उनका पेड़ एक चक्रवात सा महसूस करता। अब उसका यूँ रातो को सजना, तेल लगाना उनको अखरता। पेड़ धीरे -धीरे सींचते, बढ़ाते अब बलसाली बन चूका था, गगन को छू रहा था.

आज भी १४ फेब्रुअरी को वो सज के इंतज़ार कर रही थी. आज उसने पहले ही कपड़े जा के दे दिए थे. उसने ही कुछ दिन पहले बताया था की आज का दिन ख़ास है प्यार के लिए. इसमें अपने ख़ास को कुछ ख़ास सौगात देते हैं. उसने ही समझाया था की कैसे आसान है उसके लिए ये ख़ास दिन मनाना की सुको कोई रोकेगा नहीं। लेकिन बहार उस जैसे लोगो के मिलने पे, समाज-सुधारक, चिल्लाने लगते हैं, लाठी चलाते है, शादी करवा देते है. सीधी सी औरत, जिसकी दुनिया छोटी थी, उसने कुछ नहीं कहा और सपने सजाने लगी की वो भी अपना प्रेम -दिवस मनाएगी। आईने में अपने केसुओं को देखते इंतज़ार कर रही थी, उनके आने का, अपने सौगात मांगने का और उनको सौगात देने का. वो आये, दरवाजा खोला, बिस्तर पे बैठे, वो मुड़ी, इठलायीं, जूठ्मूठ का मुह बनाया। उन्होंने एक कागज़ का बण्डल निकला, उसको हाथ में दिया। उसने इधर-से-उधर उसको पलटा और टेबल पे रखते पूछा, ” ये क्या है? और कहाँ थे अब तक, मैं इंतज़ार कर रही थी?” उसने कहा तुम्हारे लिए है और मुझे हस्ताक्षर कर के दे दो.
उसने कहा,” क्या है लेकिन ये?” उसने एक जबाब दिया,”तलाक के कागज़।”

 

परमीत सिंह धुरंधर

हैप्पी वैलेंटाइन डे -2016 (Happy Valentine Day -2016)


वो नशा ही क्या?
जो उतर जाए.
हम अब तक बेहोस हैं,
उनकी जवानी में.
बरसों पहले,
एक बार बटन टुटा था,
चोली का.
अब तक अँधेरा है,
इन आँखों में.
वो खो गयी,
उस एक रात के बाद.
जामने में,
पैसों की चमक में.
मैं रह गया यूँ ही,
भटकता – जलता,
गरीबी में, भुखमरी में.

 

 

 

परमीत सिंह धुरंधर