मुझे कोई उपेक्षा नहीं,
की तुम सीता – सावित्री बन के रहो,
मगर ये भी तो कहो,
जब कह ही रही हो खुद ही,
की अब तक कितनो को,
सीता – सावित्री बनके छला है.
मैं उन पंडितों में नहीं जिन्हे बस,
विश्वामित्र का दम्भ ही दिखा है,
मैं वो पंडित हूँ,
जिसकी कलम ने हमेसा,
मेनका को बस चरितहीन ही लिखा है.
भूख से बिलखते बच्चे को जिसने छोड़ा,
बस इंद्रा और सवर्ग के चाह में,
लिखते रहे सब उसको बस नारी की विवसता,
मैंने उसको बस व्याभिचार ही लिखा है.
परमीत सिंह धुरंधर