तीखी नजर


पतली कमर पे तीखी नजर लेकर
क्या करोगी रानी?

छमक – छमक के चलती हो
कहाँ बिजली गिराओगी रानी?

प्यासे- प्यासे कब से है हम
अधरों से दो बूंदें कब छलकावोगी रानी?

परमीत सिंह धुरंधर

नून – रोटी खाउंगीं


रंग- तरंग आके संग मेरे बैठ गयी
एक हवा भी कहीं से, मेरी जुल्फों में बंध गयी.
दरिया ने माँगा है पाँव मेरे चूमने को
सागर ने सन्देश भेजा है ख्वाब मेरे पालने को.
और मेरे वक्षों पे चाँद की नजर गड़ गयी.

भौरें सजा रहे हैं पराग ला – लाकर मेरे अधरों को
और कलियाँ खिल – खिलकर मेरे अंगों पे गिर रही.
दिन मांगता है चुम्बन मेरे गालों का
और मेरे नयनों में स्वयं निशा है उतर गयी.

ना दरिया को पाँव दूंगी, ना सागर को ख्वाब
अल्हड मेरी जवानी, करुँगी Crassa पे कुर्बान।
मेरा रसिया है बस छपरा का धुरंधर
जीवन संग उसके गुजार दूंगी
नून – रोटी खाउंगीं, पर न उसको दगा दूंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

हरी मिर्च न लगाया करो


मीठे – मीठे अरमानों पे मेरे, हरी मिर्च न लगाया करो
हल्दी पीस के बैठी हूँ बालाम, यूँ सौतन से न छपवाया करो.

गरम किया है तेल सरसों का, गूँथ के बैठी हूँ चंपा – चमेली
मेरे ह्रदय के पुष्पित पुष्पों को, यूँ सौतन का गजरा न बनाया करो.

परमीत सिंह धुरंधर

लालू – राबड़ी


एक लालू – एक राबड़ी
प्रेम जैसे हेमामालिनी।
एक की चाहत दूजे के गाल की
एक के मुख पे हर पल नाम दूजे की.
युग-युगान्तर की ये जोड़ी
प्रेम जैसे हेमामालिनी।

एक नहीं, नौ – नौ संतानों का सुख
देख एक दूजे को भूल जाते हर दुःख।
एक अलबेला – एक अलबेली
प्रेम जैसे हेमामालिनी।
एक लालू – एक राबड़ी
प्रेम जैसे हेमामालिनी।

परमीत सिंह धुरंधर

ये तेरा मोहल्ला है


जितना भी प्यासा हूँ मैं
ये तेरी नजरों का साया है.
लड़ता हूँ पेंच मैं भी बहुत
मगर ये तेरा मोहल्ला है.

क्या संभालोगे खुद को तुम
जवानी में बहुत नशा है.
इस उम्र में कब कहाँ किसी ने?
कोई घर बसाया है.

परमीत सिंह धुरंधर

गरल सहज है


एक परम है, एक ही सत्य है
शिव के आगे समस्त शुन्य है.
रंग – तरंग के सब हैं प्यासे
बस योगी के कंठ में गरल सहज है.
इस छोर से उस छोर तक
ना आदि, ना इसका कोई अंत है.
धूम मचाती चली थी गंगा
अब योगी के जाटवों में घर है.
उसी योगी के चरण में मैं हूँ
बस यही चरण मेरा जीवन है.

परमीत सिंह धुरंधर

ये वस्त्र अब दरिंदे


ये प्रेम की वादियाँ
ये रातों के शिकंजे।
ये जवानी का दौर
और ये तेज होते पंजें।

धमनियों में दौरने लगा है
अब लहू कुछ यूँ
की जिस्म को लगते हैं
ये वस्त्र अब दरिंदे।

तुम्हारी बाहों में आकार
यूँ आजाद होने का एहसास है
जैसे आसमा के तले
पंख पसारे परिंदे।

परमीत सिंह धुरंधर