बिहारी


मन का बिहारी
तन का बिहारी
हारा है कब, बताओ?
जब तक है लाठी हाथों में
किसने पछाड़ा, बताओ?

हम जो उगा दे वो बंजर पे फूल
हम मिटा दे चाहे पत्थर या शूल
भोलेनाथ के सिवा
कहीं सर झुकाया तो बताओ।
मारिसस भी जाके
छपरा को भुलाया तो बताओ।

वो ले गए सोना
वो ले गए चांदी
काले पीतल को
सोना न बनाया तो बताओ।
उलझनों से कभी मुख चुराया
तो बताओ।

परमीत सिंह धुरंधर

माटी से सिंहों को गढ़ा


गुरु से बढ़कर कोई हुआ है क्या?
उसमे गुरु गोविन्द सिंह जी
जिनके नाम में ही पुण्य जुड़ा।

जब धरती हुई पतित और पुण्य, शुन्य बना
तब चाक पे माटी से सिंहों को जिसने गढ़ा.

और सौ – सौ बाजों से टकराने चोंच
एक – एक चिड़िया उड़ी
गुरु ने ऐसा कर्म का पाठ पढ़ाया.

परमीत सिंह धुरंधर

परफेक्ट प्यार


उम्र भर जो भागी एक परफेक्ट प्यार को
अब लिख रहीं हैं की प्यार परफेक्ट नहीं होता।
इससे बड़ी प्यास क्या होगी जीवन में?
प्यार पाकर भी कोई प्यार नहीं पाता।

पिता की गोद छोड़कर जो भागी थी प्यार में
उसके चार -चार बच्चों की माँ बनके भी आनंद नहीं आता.
इससे बड़ी प्यास क्या होगी जीवन में?
प्यार पाकर भी कोई प्यार नहीं पाता।

जुल्फों में बांधकर जिसने कइयों को डुबाया है
अजब है उस कातिल को अब क़त्ल का मजा नहीं आता.
इससे बड़ी प्यास क्या होगी जीवन में?
प्यार पाकर भी कोई प्यार नहीं पाता।

ये शहर छपरा सभी का है सिर्फ मेरा ही नहीं
मगर हर किसी के नाम में छपरा नहीं होता।
इससे बड़ी प्यास क्या होगी जीवन में?
प्यार पाकर भी कोई प्यार नहीं पाता।

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी भर की कमाई


किस्से हैं, कहानी हैं
हर दर्द की निशानी है
मिलती हो जब तुम तो
चढ़ती जवानी है.

ढलती हैं आँखों से
जब तुम्हारे ये शर्म
आँगन से बथान तक
छा जाती हरियाली है.

हर धुप तुमसे निखरी
और मीठी है चांदनी भी
तेरे ओठों पे ये मुस्कराहट
जिंदगी भर की कमाई है.

परमीत सिंह धुरंधर

सौतन के सेज पे


जोबन चढ़ल, नयना मिलल
चुनर उड़ल, चूड़ी टूटल
राजा जी तहरे ही खेत में.
ललुआ भइल, भलुआ भइल
भइल सारा खेला
राजा जी रउरे ही खेत में.
छोड़ के फिर आपन खेत
बइठल बानी कौना, सौतन के सेज पे.

परमीत सिंह धुरंधर