Alone in happiness


The dream I have is dying

I cannot do anything to make it survive.

The color of the sky 

And the smell in the air 

Keep reminding me that 

I am not from here. 

The enjoyment of technology 

And the excitement of advancement in technology 

Donot provide any happiness. 

It just makes us to forget from where are.

Social medias are increasing 

Without any social value.

We are creating jungles of selfie

And not of trees. 

We are sharing our happiness 

Without involving anyone.

In the last, we are alone in our happiness.

The more I want to go back 

The more I am addicted to it.

We shout we are creating a world

But it is pseudo, and virtual. 

Rifle Singh Dhurandhar

तन्हाई


वो अब लौट नहीं सकती
और मैं दिल बदल नहीं सकता।
पति, देवर, सास-ससुर, बच्चे
जिंदगी का हर रंग जिया उसने।
मैं उस मुकाम पे आ गया की
तन्हाई के सिवा कोई रंग
भर नहीं सकता।

Rifle Singh Dhurandhar

ताउम्र


ताउम्र प्यार की आरजू रही.
ताउम्र वो ख़्वाबों में आती रहीं।
ताउम्र सीने में एक बेचैनी सी रही
ताउम्र वो छज्जे से मुस्कराती रहीं।

ताउम्र मैं दौलत कमाता रहा
ताउम्र झोली मेरी खाली रही.
ताउम्र मेरे हौसले टूटते रहे
ताउम्र माँ मेरी, हौसले बढाती रही.

Rifle Singh Dhurandhar

Kiss in Mumbai


The girl was going easy
making me crazy.
That night was in Mumbai
we were on the road.
Within a second
she gave a kiss like a storm.

Before that moment
I was devastated and a hopeless man.
She gave the sweetest
shortest-shocking moment
which I desired again.
The long 15 years are like a dry river.
The memory of that night
brings a monsoon with cold breeze and rain.

Rifle Singh Dhurandhar

ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन इश्क़


इश्क़ दो तरह की होती
ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन
शीतकालीन:
नरम-नरम घास पे
ओस की बूंदें
उसपे अपने पाँव
सिरहन सी होती
मीठी लगती ताप.

ग्रीष्मकालीन:
छिटक-छिटक के
लालिमा उषा की
क्षितिज से बुलाती नाम
कलरव करते पक्षी
मीठी पेड़ों की छाँव।

काँधे पे हल लिए
खेत जाता किसान
दोपहर में नहा -खा
चारपाई पे लेता आराम।

शीतकालीन:
सुबह – शाम जलती अलाव
चूल्हे की अंगीठी
रात के पड़ाव पे
विरहा की तान
और गृहणियों के गान.

परमीत सिंह धुरंधर 

लम्बी उड़ान


मौजों ने साहिल तक आते-आते अपना रंग बदला है
सज-धज के निकली थीं, अब सादगी का चोला है.

संग सांखियाँ थीं, जवानी थी, अल्हड सब, मस्तानी थीं
आते-आते यहाँ तक सबको बिछुड़ना है.

ऊँची हसरते लेकर निकले थे जो लम्बी उड़ान पे
ऐसे मंजे उस्तादों को भी अंत में हाँ थकना है.

Rifle Singh Dhurandhar

मुसाफिर


किसी नजर की तलाश ही हैं जिंदगी का भटकाव
ढल जाती है जिंदगी फिर बिना किसी पड़ाव।
रुत तो कई आयी पर रहा मुसाफिर का वो ही हाल
नीचे छाले, ऊपर धुप, ना छावं ना कोई आराम।
राहें तंग, कंकर -पत्थर सी, मंजिल भी रंगहीन-उदास
धैर्य, प्रार्थना, प्रयास से ही संभव उत्कर्ष -उत्थान।

Rifle Singh Dhurandhar

छरहरी


अभी तुम हसीन हो, अभी नाजुक बड़ी हो
अभी मिलेंगे तुमको गली-गली में मजनू।

अभी तुम नई हो, कातिल छरहरी हो
अभी तुम्हारे लिए चमकेंगे सारे जुगनू।

जिधर तुम डाल दो अपनी ये दिलकस नजर
उधर ही बैठे हैं तुमपे लुटाने को सभी आबरू।

Rifle Singh Dhurandhar

पेंच होता है


प्रेम होता है जिस्म से और दिल रोता है
नजर के खेल में बस ये ही पेंच होता है.

रोकने से रुक जाए ये मुमकिन नहीं
बेवफाओ का बस ये ही अंदाज होता है.

Rifle Singh Dhurandhar