चरित्रा शुभकर


लूटकर कितनी माँ का आँचल,
बैठी है वो  दर पर अपने आँचल को फैलाकर.
वो खुश है अपने दामन में  खुशियों को पाकर,

और नाम रखा है उसका चरित्रा शुभकर.
सोच-सोच कर आने वाले कल को,
हर्षित हो उठता है उनका चितवन,
और मेरी  आँखे देख रही है, परमित
बिलखते हुए फिर किसी माँ का तन-मन…….Crassa

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