कक्षा बारह की मोहब्बत


वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो रुक-रुक कर चलती थीं,
मैं चल-चल के रुकता था।
वो किताबों कि दुकानों पे,
उनका पन्नों कों पलटना,
औटो में बैठे-बैठे,
उनका उतर जाना।
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो रुक-रुक कर देखती थीं,
मैं देख-देख के रुकता था।
कभी बैठ न सके हम,
संग में नीचे किसी डाल के,
ना छू ही सके हम,
संग में हवावों के झोंकें।
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो लिखती थीं अपने पेज पे,
मेरी कलम को ले के,
मैं उनकी कलम से,
अपनी किताबों को भरता था।
जाने कहाँ होंगी,
वो किसकी बाँहों में,
पर दिल ये धड़कता है,
उनकी ही यादों में।
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो रोटी भी दांतों से,
काटती थी मुझे देख के,
पीने के ही बहाने, नल पे
छींटे मैं उनपे उड़ाता था।
न लौट के ही आएगी,
वो मेरी जिंदगी,
पीएचडी तक हो गयी,परमीत
न कोई वैसी ही फिर मिली।

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