पर्दा


आँखों से पिला दूंगी,
पल- दो- पल तो जरा बैठों।
आँचल ही तो है सीने पे,
इसे तुम पर्दा तो न समझो।
हर दूरी मिटा दूंगी,
पल- दो- पल तो जरा बैठों।
काजल ही तो है आँखों में,
इस तुम इंकार तो न समझों।
सब कुछ मिटा दूंगी,
पल- दो- पल तो जरा बैठों।
बाबुल ही तो हैं आँगन में,
इस शैयार तो न समझों।
सीने से लगा लुंगी, परमीत
पल- दो- पल तो जरा बैठों।

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