इश्क और गंजापन


इश्क इतना भी न कीजिये,
बस रातें ही जीवन में हो.
वो तो बसा लेंगी अपना घर,
कहीं आपका ही आँगन सुना न हो.
इश्क इतना भी न कीजिये,
बस रातें ही जीवन में हो.
वो तो लहरा लेंगी जुल्फें,
किसी और के चेहरे पे,
कहीं आपके माथे पे,
गंजापन न हो.
इश्क इतना भी न कीजिये,
बस रातें ही जीवन में हो.
लूट कर हज़ारों कि महफिले,
वो पूजी जाएंगी सीता बन कर,
कहीं तुम्हारी सच्ची मोहब्बत,
रावण कि तरह जलती न हो.
इश्क इतना भी न कीजिये,
बस रातें ही जीवन में हो.
ये दस्तूर है इस जामने का,
सावित्री बना के उनको रखना,
कहीं कोई तुम्हे यमराज,
कह के गलियाता न हो, परमीत

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