गुलाब और परमीत


आज तो मेरे १४ साल के दोस्त गुलाब ने भी दोस्ती तोड़ दी. मैंने सोचा क्यों ना विदेशी धरती पर विदेशी कन्या को प्रेम-निवेदन किया जाय. आज तक मैंने जितने भी प्रेम-निवेदन कियें, उनमे मेरे दोस्त ने हमेशा साथ दिया चाहे जितनी भी जिल्लत हुई हो, लेकिन आज उसने साफ़ इनकार कर दिया. आखिर कब तक वो मेरा साथ दे या अब उसे मेरे दोस्ती में वैसा मज़ा नहीं मिलता. जैसे ही मै आज उससे मिला और अपना मकसद बोला पाहिले तो उसने मुझे हतोसाहित किया, फिर बात ना बनता देख बोला की अब उसमे धीरज नहीं की, वो और जिल्लत नहीं सहेगा. अरे भाई मेरे हाथ में आने पे उसकी किस्मत क्या हो जाती है. पैरों के नीछे कुचलना तो दूर कोई उसे छूता भी नहीं. उसने आखिर में एक सवाल पूछा की क्या अब तक किसी ने मेरे हाथ से उसे ग्रहण किया है. और उसने मुझे कहा की वो अब मेरा साथ नहीं दे सकता. मेरे साथ रहने पर उसका अर्थ, उसका प्रेम-प्रसंगता नष्ट हो जाती है. मैंने भी आज अपने दोस्त को अलविदा कह दिया. उसने सोचा की अब शायद मै कुछ नहीं करूँगा. उसने मुझसे कहा की बुरा नहीं मानना , ये तेरे भलाई के लिए कर रहा हूँ. मैंने कहा दोस्त मै आज बोलू भी तो कोई फायदा नहीं. परमित सिंह तो तुम्हारे बिना भी प्रेम-निवेदन कर सकते है, ये तो तुम थे जिसने कहा था १४ साल पहिले, की आज कल कोई प्रेम समझता नही, मनुष्य अब प्रेम के महत्व को समझता ही नहीं. जब लोगो ने तुम्हे छोड़ दिया था तब मैंने तुम्हारी महानता को दर्शाया. मेरी आवाज ही काफी है मेरे लिए. मै चल निकला अपनी राह. गुलाब ने भी वैसे ही हंसी बिखेरी जैसे आज तक उन सभी ने जो मेरी मदद लेने के बाद मुझे वेव्कुफ़ कह कर मुझ पर हँसते है. अपनी दबी हुई हंसी में उसने कहा, नहीं बदलेगा साला परमीत सिंह, मैंने सुना दर्द हुआ, लेकिन फिर सोचा हर किसी की चाहत ये ही है की मै बदल जाऊं और तब जब वो धोखा दे कार्य समझाने की कोशिस करते है की उन्होंने धोखा नहीं दिया. मै दो पल रुका और पलट कर बोला की बदलना उनकी आदत है जिनकी सुन्दरता गुलाब पर निर्भर होती है…………..परमीत

One thought on “गुलाब और परमीत

Leave a reply to Beenu Raj Cancel reply