ए माई हो, बाबुल से कह द,
कर देस हमर बिदाई हो,
ए माई हो.
दूल्हा चली, कौनों बोका आ लोला,
पर मत करिहन, कौनो केजरीवाल,
संग हमर सगाई हो.
ए माई हो.
अरे कहे हो बबुनी, बोल अइसन बोलअ तारु,
कतना छाईल बा महंगाई हो,
तबे तो छेडले बा केजरी लड़ाई हो,
दुनिया करता कतना देखअ बड़ाई हो,
कइसन भाग्य होई कि तहार,
कि बंबू तू ओकर लुगाई हो.
ए माई हो, ताहर उम्र गइल निकल,
ताहरा ना नु ई बुझाई हो,
कहिवो पलट जाई, कहिवो सुलट जाई,
हद त तब होई, जब कही उ हमके पराई,
अ पराई के कही आपन लुगाई हो.
ए माई हो.
अरे खाई हमार, और दुसरा के,
आँगन में बिछाई आपन चारपाई हो.
ए माई हो, बाबुल से कह द,
कर देस हमर बिदाई हो,
ए माई हो.
दूल्हा चली, कौनों बोका आ लोला,
पर मत करिहन, कौनो केजरीवाल,
संग हमर सगाई हो.
Month: March 2014
मोहरा
अगर मैं यूँ ही इम्तिहानों को ठुकराता रहा,
मुमकिन है कि मैं केजरीवाल बन जाऊं,
पर मेरी तमन्ना सल्तनत कि है,
न कि मैं किसी शह का मोहरा बन जाऊं।
अगर मैं यूँ ही सबपे उंगलियां उठता रहा,
मुमकिन है कि मैं केजरीवाल बन जाऊं,
मगर मेरी तमन्ना बुलंदियों कि है,
न कि मै किसी कि सीढ़ी बन जाऊं।
अगर मैं यूँ ही भौंकता रहा,
मुमकिन है कि मैं केजरीवाल बन जाऊं,
मौत पसंद है मुझे रण में लड़ते हुए, परमीत
न कि मैं किसी विषकन्या का पंथ बन जाऊं।
किताबें या प्रेमिका
क्यों खरीदता हूँ मैं इतनी किताबें,
हर शख्श पूछ रहा है इस बाजार में,
क्या नहीं है कोई मेरे जीवन में प्रेमिका,
जो अनजान हूँ मैं साजों-श्रृंगार से.
मुस्कुराता हुआ चला जाता हूँ,
बिना किसी विवाद में उनसे,
क्या कहूं उनसे, कि किस कदर,
अनजान हैं वो, अपने जीवन में,
बहन-भाई-माँ के प्यार से, परमीत
गुमराह
अंदाज बदल-बदल के रखते है,
वो आँचल को अपने सीने पे,
कहीं गुमराह न हो जाए कोई,
देख के रंग उनके योवन के.
निकलते है बदल-बदल के,
वो राहें अपने घर से,
कहीं बवाल न हो जाए, देख के
उनका मुखड़ा इस शहर में, परमीत
समंदर और मैं
वो रंग नहीं आसमान पे,
जो मुझको फीका कर दे.
वो फूल नहीं इस गुलशन में,
जो मुझको दीवाना कर दे.
बदला है हमने,
हवावों के रुख को,
कई बार इस समंदर में.
वो धार नहीं इन लहरो में,
जो किनारों को मेरे,
डूबा दे, परमीत.
चूड़ी
इतनी दुरी भी न रखिये,
कि जीना भी मुश्किल लगे,
चूड़ी इस कदर न तोड़िये,
आइना भी अब सौतन लगे, परमीत
कक्षा बारह की मोहब्बत
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो रुक-रुक कर चलती थीं,
मैं चल-चल के रुकता था।
वो किताबों कि दुकानों पे,
उनका पन्नों कों पलटना,
औटो में बैठे-बैठे,
उनका उतर जाना।
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो रुक-रुक कर देखती थीं,
मैं देख-देख के रुकता था।
कभी बैठ न सके हम,
संग में नीचे किसी डाल के,
ना छू ही सके हम,
संग में हवावों के झोंकें।
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो लिखती थीं अपने पेज पे,
मेरी कलम को ले के,
मैं उनकी कलम से,
अपनी किताबों को भरता था।
जाने कहाँ होंगी,
वो किसकी बाँहों में,
पर दिल ये धड़कता है,
उनकी ही यादों में।
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो रोटी भी दांतों से,
काटती थी मुझे देख के,
पीने के ही बहाने, नल पे
छींटे मैं उनपे उड़ाता था।
न लौट के ही आएगी,
वो मेरी जिंदगी,
पीएचडी तक हो गयी,परमीत
न कोई वैसी ही फिर मिली।
पर्दा
आँखों से पिला दूंगी,
पल- दो- पल तो जरा बैठों।
आँचल ही तो है सीने पे,
इसे तुम पर्दा तो न समझो।
हर दूरी मिटा दूंगी,
पल- दो- पल तो जरा बैठों।
काजल ही तो है आँखों में,
इस तुम इंकार तो न समझों।
सब कुछ मिटा दूंगी,
पल- दो- पल तो जरा बैठों।
बाबुल ही तो हैं आँगन में,
इस शैयार तो न समझों।
सीने से लगा लुंगी, परमीत
पल- दो- पल तो जरा बैठों।
सांवरे
मैं रात भर सोती नहीं,
जब तुम आ जाते हो सांवरे।
जब सीमा पे रहते हो, तुम
तो आँखों में यूँ ही नींद नहीं।
अब क्या देखूं मैं आईना,
जब तुम बैठे हो पास सांवरे।
जब सीमा पे रहते हो, तुम
तो मैं कभी सजती ही नहीं, परमीत।
माँ
मेरी बागों में जितने भी फूल खिले है,
तेरी आँचल में जब तक न गिरेंगे,
चैन नहीं है इनकी पखुड़ियों को,परमीत
जब तक ये तेरे पावों को न चूम लेंगे, माँ.