लाहौर के बादल


वो लाहौर की हैं,
या फिर कराची से,
दिल कहता है,
की कोई रिश्ता है,
उनका मेरे काशी से.
आँखों में वही,
काजल हैं,
जो उड़ता है,
धुंवा बनके,
अब भी मेरे,
गाछी में.
एक नजर से ही,
वो अपने,
सोंख गयीं,
दिल में उठती,
गंगा की हर,
धारा को.
बादल उठें है ये,
पेशावर से,
या बलूचिस्तान से,
पर बरस रहे हैं, परमीत,
ये तेरे,
दिले-हिंदुस्तान पे.

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