जो रातों में मिलता है,
इतना करीब आके,
वो दिन के निकलते ही,
इतना अनजान क्यों है.
पिघलता है जो वर्फ सा,
शाम के ढलते ही,
वो सूरज की किरणों के,
आते ही,
यूँ पत्थर सा क्यों है.
कहते हैं सब,
नाजुक होता है दिल,
आँचल में रहने वालों का,
फिर,
दूसरों के दर्द पे,
वो परमीत,
इतना मुस्कराता क्यों है.