गर्व


सागर की लहरे उछलती रहीं,
नौका मेरी डुबाती रहीं।
किनारों को मेरे डूबा के,
मुझे भटकाती रहीं।
ये सच है की,
मैं कुछ पा न सका जीवन में।
पर धुरंधर को राजपूत होने,
का गर्व कराती रहीं।

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