लम्बी उड़ान


मौजों ने साहिल तक आते-आते अपना रंग बदला है
सज-धज के निकली थीं, अब सादगी का चोला है.

संग सांखियाँ थीं, जवानी थी, अल्हड सब, मस्तानी थीं
आते-आते यहाँ तक सबको बिछुड़ना है.

ऊँची हसरते लेकर निकले थे जो लम्बी उड़ान पे
ऐसे मंजे उस्तादों को भी अंत में हाँ थकना है.

Rifle Singh Dhurandhar

जिंदगी


गमे-दर्द में तुम बहकने लगे हो
सफर जिंदगी का, तुम थकने लगे हो.
गमे-दर्द में तुम बहकने लगे हो
ये सफर जिंदगी का, तुम थकने लगे हो.

सूरज वही है, चंदा वही-२
एक तारे के टूटने से डरने लगे हो.
पर्वत तुम्हारे हैं, पहाड़े तुम्हारी-२
एक दरिया के बहाव पे तुम थमने लगे हो.
गमे-दर्द में तुम बहकने लगे हो
ये सफर जिंदगी का, तुम थकने लगे हो.

काँटों से भरी है यहाँ राहें सभी की-२
तुम खुद ही हाँ दामान चुराने लगे हो.
क्या पाना यहाँ और खोना यहाँ-२?
ये कैसे सवालों में खुद को उलझाने लगे हो?
गमे-दर्द में तुम बहकने लगे हो
ये सफर जिंदगी का, तुम थकने लगे हो.

Rifle Singh Dhurandhar

परिंदा बेबस जिंदगी में


मैं तो परिंदा बेबस जिंदगी में
क्या सुबहा, क्या शाम मेरी?
उड़ता हूँ तो धरती छीन जाती
लौटता हूँ तो आसमा, कहाँ मेरी।

Rifle Singh Dhurandhar

The meaning of celebration


Flower without thorns
Streams without pebbles
Life without sickness
Eyes without crying
Difficult to find.

Success without failures
Love without pains
Morning without sun
Ocean without waves
Difficult to believe.

Rise and falls make a life
Like a husband and wife.
Without these, there is no meaning
Of celebration.

Parmit Singh Dhurandhar

जीवन-पथ पे भीष्म सा त्याग करो


जो मिले हैं, उनको प्यार करो
जो बिछुड़ गए, उन्हें याद करो
तुम मानव हो, बिना बिचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर प्रयास करो.

तुम देव नहीं, जो भोग मिलेगा
तुम पशु नहीं जो स्वछन्द विचरण करेगा
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर अभियान करो.

पथ में कुछ छाले मिलेंगें
पथ में कुछ कांटे भी मिलेंगे
सुन्दर अप्सराएं कभी,
दिखलायेंगी अपनी अदायें
तुम अपने ह्रदय से अब
माया-मिलन-मोह का त्याग करो.
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, निरंतर हुंकार भरो.

क्या है नारी के देह में?
और क्या है उसके वक्षों पे?
कौन है सुन्दर वो नारी जो?
गृहणी बनकर संतुस्ट हुई
और कौन तृप्त हुई?
भला नगर-वधु बनकर।
तुम मानव हो, बिना विचलित हुए
इस जीवन-पथ पे, भीष्म सा त्याग करो.

परमीत सिंह धुरंधर

बरसे भी तो जलती ही आग है


कण – कण में व्याप्त है
फिर भी अपर्याप्त है
लालसा है मन की
या लिखित बेचैन ही भाग्य है.
अंत नहीं भूख का
जहाँ मौत भी एक प्यास है.
आँखों के काजल सा
बिजुरी में बादल सा
बरसे भी तो हाँ, जलती ही आग है.
दिखता नहीं
निकलता नहीं
छुपता नहीं, फिर भी
रौशनी के मध्य
एक अदृश्य – अन्धकार है.

नयनों के खेल सा सा
दिलों के मेल सा
जो तोड़े न मन को
जो जोड़े ना तन को
जिससे मिलन को
हर पल उठती हाँ टिस है
मधुर मिलन पे फिर
लगती भी ठेस है.
ऐसी है वासना
फिर भी है छोटी
आगे उसके
ऐसा अनंत तक उसका विस्तार है.

बांधों तो वो बांधता नहीं है
साधो तो वो सधता नहीं है
कालचक्र से भी परे है वो
काल से भी वो मिटता नहीं है.
सृष्टि उसके बिना अपंग – अपूर्ण है
और उसके संग सृष्टि, नग्न – न्यून है.
है मिश्री के मिठास सा
अंगों पे श्रृंगार सा
नारी जिसके बिना सुखी एक डाल है.
और यौवन जिसके बिना हाँ बस एक लास है.

परमीत सिंह धुरंधर

माहिर


निकला था राजकुमार सा
अब मुसाफिर हो गया हूँ.
ए जिंदगी देख तेरे इस खेल में
एक मासूम मैं, कितना शातिर हो गया हूँ?

देखता था हर एक चेहरे में माँ और बहन ही
पर इनकी नियत और असलियत देख कर
मैं भी अब माहिर हो गया हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

बादल बरसने से इंकार करने लगे हैं


बादल बरसने से इंकार कर रहे हैं
हवाओं का रुख भी बदलने लगा है
फूल, कलियाँ, भौरें, सब मुख मोड़ने लगे हैं.
ए दिल ये किस मोड़ पे आ गया हूँ ?
चाँद, तारे, सब राहें बदलने लगे हैं.
किस से कहें हाले-दिल अपना?
हर चेहरा मुझे देख के नकाब पहनने लगा है.
बादल बरसने से इंकार करने लगे हैं.

जो सत्ता में हैं, वो मेरे अब साथी नहीं
जो विपक्ष में हैं, वो अब साथ आते नहीं।
वो जो अब तक मेरी हर परेशानी में
मेरे पास बैठे थे.
वो जो अब तक अपनी हर परेशानी में
मुझे अपने पास बुलाते थे.
मुझसे सम्मिलित हर समीकरण
वो अब बदलने लगे हैं.
बादल बरसने से इंकार करने लगे हैं.

नजरों का बस एक फेर है जिंदगी
वो जो मेरे थे कल तक
अब मुझसे कतराने लगे हैं.
वो जो मुझसे पूछ कर सवरते थे
वो जो मेरे कहने पे रंग बदलते थे
इस कदर बदल गया है राहे -सफर उनका
की भीड़ को मेरे खिलाफ उकसाने लगे हैं.
बादल बरसने से इंकार करने लगे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर