ज्ञान वो ही, विज्ञान वो ही,
जिसमे ना अभिमान हो.
और बिक जाए जो बाजार में,
उसका फिर क्या सम्मान हो.
रक्त वो ही, वक्त वो ही,
जो अपने साथ हो,
जो खड़ा हो दुश्मनो,
की भीड़ में,
उससे फिर क्या लगाव हो.
परमीत सिंह धुरंधर
ज्ञान वो ही, विज्ञान वो ही,
जिसमे ना अभिमान हो.
और बिक जाए जो बाजार में,
उसका फिर क्या सम्मान हो.
रक्त वो ही, वक्त वो ही,
जो अपने साथ हो,
जो खड़ा हो दुश्मनो,
की भीड़ में,
उससे फिर क्या लगाव हो.
परमीत सिंह धुरंधर